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उपनिषद् की शिक्षा

उपनिषद उद्घोष करते हैं कि मनुष्य देह, इंद्रिय और मन का संघटन मात्र नहीं है, बल्कि वह सुख-दुख, जन्म-मरण से परे दिव्यस्वरूप है, आत्मस्वरूप है। आत्मभाव से मनुष्य जगत का द्रष्टा भी है और दृश्य भी। जहां-जहां ईश्वर की सृष्टि का आलोक व विस्तार है, वहीं-वहीं उसकी पहुंच है। वह परमात्मा का अंशीभूत आत्मा है। यही जीवन का चरम-परम पुरुषार्थ है। इस परम भावबोध का उद्घोष करने के लिए उपनिषद के चार महामंत्र हैं। तत्वमसि (तुम वही हो), अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्मा हूं), प्रज्ञानं ब्रह्मा (आत्मा ही ब्रह्मा है), सर्वम खिलविद्म ब्रह्मा (सर्वत्र ब्रह्मा ही है)। उपनिषद के ये चार महावाक्य मानव जाति के लिए महाप्राण, महोषधि एवं संजीवनी बूटी के समान हैं, जिन्हें हृदयंगम कर मनुष्य आत्मस्थ हो सकता है।

उपनिषद की शिक्षा मनुष्य देह को मरण धर्मा मानकर सतत् परिवर्तनशील बताती है। मनुष्य आत्मस्वरूप है। अत: संसार के समस्त आकर्षण, साधन, संबंध, बंधन, क्षणिक और भ्रम हैं। अज्ञान ही उसे मोहपाश के प्रबल बंधन में बांधता है। जीवात्मा इन बंधनों से परे और पार है। उसमें अनंत ऊर्जा, असीम शक्ति व सामर्थ्य तथा विपुल शांति, प्रेमज्ञान व आनन्द का परम् पुंज समाहित है।

उपनिषद में श्रवण, मनन और निदिध्यासनरूपी तीन चरणों का उल्लेख मिलता है। मोक्ष की कामना करने वाला गुरु, ग्रंथों तथा महापुरुषों से सदा ब्रह्मा के विषय में बारंबार श्रवण करे। इसके विषय में श्रद्धापूर्वक मनन-चिंतन करे, क्योंकि यही ब्रह्मा ही एकमात्र मननीय व चिंतनीय है। निदिध्यासन ध्यान का पर्याय है। इस अवस्था में साधक गुरु द्वारा ज्ञान व साधना में लीन हो जाए। उसे संकल्पपूर्वक अपनी समस्त दुर्बलताओं को त्यागकर संयम द्वारा साधना के पथ पर आरूढ़ होना चाहिए। यही उपनिषद् की पावन व दिव्य शिक्षा है, जिसे अपनाकर हम अपने आंतरिक विकास के साथ-साथ नैतिकता तथा उच्च मानवीय मूल्यों का भी संवर्धन कर सकते हैं। उपनिषदों के समान कल्याणकारी एवं श्रेयस्कर कोई भी अन्य विद्या नहीं है। इसे अपनाकर मानव ब्रह्मा से साक्षात्कार कर सकता है।

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  • Web Title:उपनिषद् की शिक्षा