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पैरोल की पोल

अगर मनु शर्मा दिल्ली के एक पांच सितारा होटल के बार में न जाते और वहां एक झगड़े में न उलझते तो शायद किसी को पता ही नहीं चलता कि वे दो महीने के पैरोल पर छूटे हुए हैं और यह पैरोल उन्हें उनकी मां की कथित बीमारी की वजह से मिली है। तब यह भी तथ्य सामने आया कि उनकी मां भली चंगी हैं और उन्होंने बाकायदा किसी महिला क्रिकेट के आयोजन की प्रेस कांफ्रेंस भी की।

जिस देश में लाखों कैदी छोटे-मोटे अपराधों में वर्षो तक जेल में सड़ते रहते हैं, एक चर्चित हत्या के आरोपी के प्रति नर्मदिली कुछ सवाल तो खड़े करती ही है। जिस व्यक्ति को कोर्ट ने जमानत देने से इंकार कर दिया था, उसे इस नर्मदिली ने खुला घूमने की छूट दे दी। मनु शर्मा वापस तिहाड़ जेल लौट गए हैं और इससे इस विवाद को खत्म करने की सहूलियत भी उन लोगों मिल जाएगी, जो मनु शर्मा को पैरोल मिलने के लिए जिम्मेदार हैं।

जेसिका लाल हत्याकांड इस बात के लिए एक उदारहण के तौर पर देखा जा सकता है कि हमारे कानून व्यवस्था तंत्र के साथ क्या-क्या गड़बड़ है। एक रसूख वाली महिला एक पुरातात्विक महत्व के जाने माने स्मारक के बगल में एक गैरकानूनी बार चलाती है, उसमें एक रसूख वाले पिता का बेटा आ कर एक महिला को इस बात पर गोली मार देता है कि महिला ने उसे शराब नहीं दी। अपराध के तमाम सुराग मिटाने की कोशिश होती है, मेडिको लीगल सबूतों के साथ छेड़छाड़ होती है और पार्टी में मौजूद सारे लोग गवाही देने से इंकार कर देते हैं। दो रईसजादे पकड़े जाते हैं, जिनका पुराना रिकार्ड ऐसा नहीं है कि उन्हें हथियारों का लाइसेंस मिले, लेकिन जिनके पास बंदूक थी।

निचली अदालत में मामला टिक नहीं पाता, लेकिन मीडिया और समाज के दबाव में फिर से जांच होती है। अब मनु शर्मा के पैरोल का मामला इसी की अगली कड़ी है कि हमारा तंत्र पैसे और रसूख वालों के लिए कितना रहमदिल है। रहमदिली अच्छी चीज है, लेकिन जब वह पैसे और रसूख से जुड़ जाती है तो वह गरीब और कमजोर के लिए बेरहमी से भी जुड़ती है। अगर कानून-व्यवस्था का तंत्र निष्पक्ष नहीं होगा तो उस पर विश्वास करना भी मुश्किल होगा। अगर वह तंत्र निष्पक्ष होगा तो मनु शर्मा को पैरोल नहीं मिलेगा और लाखों बेकसूर जेलों से छूट जाएंगे, और इस तंत्र का बोझ भी कम होगा।

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