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समाधि की आड़ में बेशकीमती जमीनों पर कब्जे

वर्षों पूर्व स्वर्गवासी हो गए बड़े बूढ़े-किसान आज भी अधिसूचित जमीनों पर कब्जे करने में मददगार साबित हो रहे हैं। हालांकि उनके नाम पर जमीन कब्जाने का कारनामा उन्हीं के नाती-पोते कर रहे हैं। पिछले कुछ महिनों से लगभग हर गांव के नजदीक किसानों की समाधि नजर आने लगी हैं। सेक्टर जू-2 और ओमीक्रान में तो रातों-रात ऐसी जमीन पर समाधि बना दी गई है, जहां अथॉरिटी लोगों को प्लाट भी आवंटित कर चुकी है।

जमीन कब्जाने का यह नया प्रचलन यहां के गांवों में हाल ही में शुरू हुआ है। अभी तक मंदिर-मस्जिद और देवी-देवताओं के नाम पर जमीनें कब्जाई जा रहीं थी, लेकिन अब वर्षों पूर्व स्वर्ग सिधार गए लोगों के नाम पर भी उनके परिजन जमीन कब्जा कर रहे हैं। तिलपता गांव में आधा दर्जन लोगों की समाधि बना दी गई हैं। इनमें कई समाधि ऐसे लोगों की भी हैं, जिनका सामाजिक कार्यों में कोई भी योगदान नहीं रहा और न ही वे ख्याति प्राप्त थे, लेकिन फिर भी उनके बेटे और पोते स्मृति को संजोने में लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं। वास्तव में देखा जाए तो यह पूर्वजों के प्रति प्रेम नहीं है, बल्कि समाधि की आड़ में बेशकीमती जमीनों को अधिग्रहण से बचाने की साजिश है। समाधि के लिए करीब चार सौ मीटर जमीन भी कब्जा कर ली गई तो उसकी कीमत 42 लाख रुपये हो गई। लोग यदि अपनी पुस्तैनी जमीनों पर अथवा अहातों में समाधि बनाएं तो काई आपत्ति जनक भी नहीं है, लेकिन जिन जमीनों पर अथॉरिटी लोगों को प्लाट आवंटित कर चुकी है, वहां समाधियों का बनाया जाना बेहद गम्भीर है। इससे प्रभावित आवंटी को पता नहीं कितने लम्बे समय तक सफर करना पड़े।

सेक्टर जू-2 में घोड़ी गांव के पास प्लाटों के लिए आवंटित भूमि में ही समाधि बनाई गई है। गांव सिरसा, लढपुरा घंघोला और खेड़ी भनौता में भी हर माह कोई न कोई समाधि बनकर तैयार की जा रही हैं। नवादा गांव में तो जी ग्रुप के लिए आवंटित एम्युजमेंट पार्क के प्लाट में समाधि के साथ-साथ मंदिर भी बनाए जा रहे हैं।

इस बारे में ग्रेटर नोएडा डीसीइओ शैलेन्द्र चौधरी का कहना है कि  समाधि बनाने पर पाबंदी नहीं है, लेकिन यदि अधिसूचित अथवा कब्जा प्राप्त जमीन पर समाधि बनाई जा रही है तो यह अपराधिक मामला है। हालांकि इस तरह के मामलों को रोकने की जिम्मेदारी अकेले अथॉरिटी की नहीं प्लाट आवंटी की भी होनी चाहिए।       

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