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सीएनटी एक्ट के 101 वर्ष पूरे

परसूडीह थाना के गदड़ा ग्राम आदिवासी आनंद भूमिज की सैकड़ों एकड़ जमीन का मामला हो या तेजी से नये उपनगर के रूप मे विकसित हो रहे मानगो की आकाश छूती अट्टालिकाओं की नींव पर दबी आदिवासियों की जमीन के लंबित मुकदमों की बात हो, हरेक मे उसी सीएनटी एक्ट यानी छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम के उल्लंघन की बात उभर कर आती है जिसका आधार बिरसा मुंडा के विद्रोह से तैयार हुआ था।

1908 में सीएनटी एक्ट लागू होने के बाद लगातार इसके उल्लंघन का सिलसिला भी चल पड़ा। यहां सीएनटी एक्ट के उल्लंघन पर नजर डालें तो जमशेदपुर और राजधानी रांची सबसे आगे हैं। चाइबासा, चक्रधरपुर, घाटशिला, खूंटी आदि इलाकों में भी इक्का दुक्का मामले दर्ज हैं। सीएनटी एक्ट उल्लंघन के अकेले एक हजार से ज्यादा दर्ज मामले जमशेदपुर  में लंबित हैं।  इनमें से कुछ भूमि उपसमहर्ता के पास तो कई मामले हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक में लंबित है।

सामाजिक कार्यकर्ता डेमका सोय ने बताया कि आदिवासी जमीन वापसी के मामले कोर्ट कचहरियों तक ही नहीं राष्ट्रपति तक मामलों को पहुंचाया गया है और न्याय की आस बकरा है। सही मायनों में यदि सभी मामलों में न्याय मिल जाए तो जमशेदपुर और आसपास के सैकड़ों भवन धाराशायी हो जाएंगे और रांची राजधानी का स्वरूप खंडहर में बदल जाएगा। 1908 के बाद शहर में कई रैयती गांवों को विलोपित कर दिया गया और जिसका ताजा उदाहरण 1971 का सर्वे है इसमें मानगो का मुकरूसाई गांव ही लापता हो गया। 

छह वर्ष पूर्व जमशेदपुर अंचल में सैकड़ों फर्जी वासगीत पर्चा जारी कर आदिवासी भूमि हस्तांतरण का मामला उजागर हुआ था लेकिन अब तक उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।सीएनटी एक्ट के तहत आदिवासी जमीन का हस्तांतरण नहीं हो सकता है लेकिन जमशेदपुर, आदित्यपुर, मानगो और रांची के शहरी इलाकों मे धड़ल्ले से आदिवासी जमीन का हस्तांतरण किया गया है।

यही नहीं कई जमीन अभी भी फर्जी तौर पर ही हथिया लिए गए हैं। सरकार ने इसके लिए भू-वापसी की प्रक्रिया शुरू जरूर की लेकिन जटिल व्यवस्था अब तक लोगों को पूरी तरह न्याय नहीं दिला पाई। वास्तव में कई-कई दशकों तक चलने वाले मुकदमों से आदिवासी परिवार जूझने की स्थिति में भी नहीं रह गये हैं।

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