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बदलती सियासत के साफ संकेत

विधानसभा के अगले चुनाव से करीब ढाई साल दूर खड़ी उत्तर प्रदेश की करवट लेती सियासत के संकेत साफ हैं। सत्तारूढ़ बसपा को विधानसभा की ग्यारह में से नौ सीटें सौंप कर जनता ने साफ कर दिया कि उसे बसपा की सरकार रास आ रही है। वहीं लोकसभा की अकेली फिरोजाबाद सीट पर राजब्बर को फतह दिलाकर वोटरों ने मनमोहन सिंह की सरकार और राहुल गांधी के नेतृत्व में यूपी में वापसी की दस्तक दे रही कांग्रेस के प्रति बढ़ते रुझान का खुलासा कर दिया है।

कागज-कलम पर यूपी की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी को एक भी सीट न मिल पाना उसके लिए खतरे की घंटी है। इसलिए भी क्योंकि वह फिरोजाबाद, भरथना और इटावा के अपने गढ़ में ढेर हो गई। यूपी में पहले ही हाशिए पर जा चुकी भाजपा अब और अप्रासंगिक होती जा रही है, यह उसका खाता न खुलने साफ है।

विधानसभा चुनावों से पहले इन उपचुनावों को उत्तर प्रदेश का मिनी चुनाव माना जा रहा था। नतीजों ने भविष्य के राजनीतिक समीकरणों को भरपूर संकेत दिए हैं। बसपा न सिर्फ नंबर एक पार्टी बनकर उभरी है बल्कि उसने मुख्य प्रतिद्वंदी सपा से उसके कब्जे वाली पाँच सीटें झटक लीं। इनमें भरथना और इटावा जैसे सपा का गढ़ मानी जानेवाली सीटें भी शामिल हैं। इतना ही नहीं उसने कांग्रेस के कब्जे वाली पडरौना और झाँसी सीटों पर भी अपना परचम लहराया है।

ये दोनों सीटें केन्द्रीय मंत्री आरपीएन सिंह व प्रदीप जैन आदित्य के लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय थीं। यही शाहजहाँपुर के पुवायां में भी हुआ जहाँ एक और केन्द्रीय मंत्री, जितिन प्रसाद की प्रतिष्ठा जुड़ी थी। यह सीट भी बसपा ने अपनी झोली में डाली। हैंसरबाजार और पुवायां विधानसभा सीटों पर जीत हासिल कर बसपा ने सुरक्षित सीटों पर अपनी बादशाहत भी कायम रखी है।

कांग्रेस ने फिरोजाबाद में जबरदस्त जीत हासिल कर इस सीट को परिवार के खाते में कायम रखने की सपा के सपने को तोड़ दिया है। वह भी तब जबकि मैदान में मुलायम सिंह यादव की बहू डिम्पल यादव थीं। फिरोजाबाद, भरथना और इटावा की यादव भूमि में सपा को मिली शिकस्त उसके दरकते वोट बैंक की ओर संकेत कर रहे हैं। उसके लिए इसे बचाए रखने की चुनौती है तो बसपा और कांग्रेस इसमें और सेंधमारी की कोई कसर नहीं छोड़ेगी यह तय है।

कांग्रेस ने फिरोजाबाद लोकसभा और लखनऊ पश्चिम विधानसभा सीट पर करीब ढाई दशक बाद जीत हासिल की है। दोनों सीटों के प्रतीकात्मक मायने अहम हैं। फिरोजाबाद सपा और लखनऊ पश्चिम भाजपा का पारंपरिक क्षेत्र रहा है। यहाँ कांग्रेस की जीत दोनों के पारंपरिक वोटरों के कांग्रेस की ओर शिफ्ट होने का संकेत हैं या नहीं विधानसभा चुनावों में और साफ होगा। वाकई ऐसा हुआ तो 2012 में सरकार बनाने के लिए यूपी की सियासत और दिलचस्प होकर उभरेगी।

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  • Web Title:बदलती सियासत के साफ संकेत