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एयर होस्टेस: आकाश में भी नहीं मिलता सुरक्षा का आसमान

एयर होस्टेस: आकाश में भी नहीं मिलता सुरक्षा का आसमान

अक्सर विमान परिचारिकाओं के साथ यात्रियों या पायलटों के दुर्व्यवहार की खबरें नुमाया होती रहती हैं। हाल ही में दो एयर होस्टेसेज ने अलग-अलग मामलों में पायलटों या अधिकारियों पर यौन शोषण के आरोप लगाए और ये मामले मीडिया में अब तक छाए हुए हैं। एयर होस्टेस या महिला कैबिन क्रू के बारे में लोगों में बहुत-सी गलत धारणाएं भी हैं। यह मान कर चला जाता है कि विमान परिचारिकाओं का काम मुस्कुराहट बिखेरते हुए यात्रियों को भोजन सर्व करना, उनकी सुविधाओं का ध्यान रखना और मजे से देश-विदेश की यात्रा करना है।
 
लेकिन यह बात पूरी तरह सही नहीं है। कैबिन क्रू की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यात्रियों और विमान की सुरक्षा है। इन्हें इस बात के लिए प्रशिक्षित किया जाता है कि आपात स्थिति में कैसे अपनी जान की परवाह किए बगैर यात्रियों को बचाया जाए।

गौरतलब है कि 1986 में अगुवा कर कराची ले जाए गए पैन-एम एयरलाइन के यात्रियों की सुरक्षा के लिए एयर होस्टेस नीरजा भनोट ने अपनी जान दे दी थी। इसी तरह 1992 में दिल्ली में रूस से पट्टे पर लिए गए एक टीयू-154 विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने पर इंडियन एयरलाइंस की एक एयर होस्टेस पूर्णिमा ने यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए अपनी जान तक जोखिम में डाल दी थी।
 
हिन्दी में एयर होस्टेस को विमान परिचारिका कहा जाता है। यह शब्द ही इस गलत धारणा को बल देता है कि ये परिचारिका यानी सेविकाएं हैं। पहले इनके लिए एक बहुत सुंदर संबोधन ‘व्योम बालाएं’ हुआ करता था, लेकिन अब वह प्रचलन में नहीं है।

कुछ साल पहले तक एयर होस्टेस बनना ग्लैमर का हिस्सा होता था, लेकिन अब आतंकवाद के इस दौर में एयर होस्टेस की जिम्मेदारी सिर्फ मुस्कुराहट बिखेरना ही नहीं है, बल्कि कई बार उन्हें मौत से दो-दो हाथ भी करने पड़ते हैं। इसके अलावा एयरलाइनों की बाढ़ आने के साथ ही जितनी ज्यादा तादाद में लड़कियां इस पेशे को अपना रही हैं और जितनी ज्यादा प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, उससे भी अब इस काम में पहले जैसा ग्लैमर नहीं रहा।
नाम न छापने की शर्त पर कुछ एयर होस्टेसेज ने बताया कि कई बार यात्री उनके साथ ओछी हरकत करने से बाज नहीं आते। उन्हें लगता है कि हमारी मुस्कराहट उनके लिए हमारे साथ बदतमीजी करने का लाइसेंस है।
विशेष रूप से लंबी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के दौरान ज्यादा शराब पीने के कारण कुछ यात्री बेकाबू हो जाते हैं, लेकिन उन्हें संभालने के लिए ‘पुरुष’ पर्सरों की मदद लेनी पड़ती है। पुरुष पर्सर एयर होस्टेस के मेल काउंटरपार्ट होते हैं, जो किसी भी आपात स्थिति में एयर होस्टेस के साथ आकर खड़े हो जाते हैं।
 
जहाज में सफर करने वाले कुछ लोग अक्सर ये भूल जाते हैं कि एयर होस्टेस संकट के समय हमारी कितनी मदद करती है। एक एयर होस्टेस ने बताया कि किसी यात्री को दिल का दौरा पड़े या अचानक किसी महिला को प्रसव पीड़ा हो तो उन्हें संभालने के लिए भी हमें प्रशिक्षित किया गया है। इतना ही नहीं, अगर विमान में बम पड़ा मिले तो उसे कैसे उठाना है, कैसे गीले कपड़े में लपेटना है और विमान के किस सर्वाधिक सुरक्षित हिस्से में रखना है, ताकि फटे भी तो कम से कम नुकसान हो, इन सबके लिए हम प्रशिक्षित हैं।

उड़ान के दौरान कई बार विमान खराब मौसम (टबरुलेंस) में फंस कर हिचकोले खाने लगता है। यात्री घबरा  जाते हैं, कई लोग उल्टियां करने लगते हैं या उनका रक्तचाप बढ़ जाता है। कैबिन क्रू की ऐसी स्थिति में यात्रियों को संभालने में अहम भूमिका होती है। उल्लेखनीय है कि विश्व की पहली महिला फ्लाइट अटैंडेंट 25 वर्षीय एलेन चर्च एक नर्स थीं, जिन्हें युनाइटेड एयरलाइन ने 1930 में नियुक्त किया था। इससे पहले 1920 के आसपास ब्रिटेन की इंपीरियल एयरवेज में ‘कैबिन लड़के’ रखे जाते थे, जिन्हें स्टीवर्ड कहा जाता था। खाना परोसने के लिए पैन एम ने 1929 में स्टीवर्ड भर्ती करना शुरू किया था।
 
कैबिन क्रू की भर्ती के लिए 18 से 25 वर्ष आयु वर्ग के ग्रेजुएट लड़के-लड़कियों को चुना जाता है। रंग-रूप के अलावा लंबाई के मुताबिक वजन की सीमा होनी चाहिए। अगर किसी लड़की की लंबाई साढ़े पांच फुट है तो वजन 58 कि.ग्रा. से ज्यादा नहीं होना चाहिए। इस बारे में भी महिलाओं और पुरुष कैबिन क्रू की भर्ती और नौकरी के दौरान स्वास्थ्य संबंधी पैमानों में भेदभाव रहता है। महिला कर्मियों का वजन अगर तय पैमाने से आधा कि.ग्रा. भी बढ़ जाए तो उन्हें उड़ान की डय़ूटी से हटाया जा सकता है, लेकिन पुरुष कर्मियों या पायलटों के लिए कोई पाबंदी नहीं होती।

एक एयर होस्टेस का कहना है कि इस डर से कई लड़कियां ‘अंडर वेट’ बनी रहती हैं और अक्सर कमजोरी और दर्द की शिकायत करती हैं। महिलाओं के वजन की समय-समय पर जांच की जाती है, लेकिन पुरुषों की ऐसी कोई जांच नहीं होती। एक और भेद-भाव भी किया जाता है। भर्ती के समय मर्द शादीशुदा हो तो कोई बात नहीं, लेकिन लड़की कुंआरी होनी चाहिए। उसे एक साल बाद नौकरी पक्की होने के बाद ही शादी की इजाजत मिलती है। यह भी शिकायत की जाती है कि पहले जहां ए-320 जैसे विमान में पांच कैबिन क्रू तैनात किए जाते थे, अब खर्च में कटौती के लिए चार किए जाते हैं, लेकिन डीजीसीए के नियमों के मुताबिक पचास यात्रियों पर एक कैबिन क्रू होना चाहिए। इससे उनके काम का बोझ बढ़ जाता है और जल्दी थकान होने लगती है।

अक्सर कहा जाता है कि विमान परिचारिकाओं का मेकअप और पहनावा भड़काऊ होता है। भारत की सरकारी एयरलाइन एयर इंडिया में तो परंपरागत रूप से महिला कैबिन क्रू के लिए साड़ी ही ड्रेस कोड का हिस्सा रही है, लेकिन निजी एयरलाइनों में महिलाओं को स्कर्ट पहननी पड़ती है। इस बारे में एक एयर होस्टेस का कहना है कि आपात स्थिति के लिए साड़ी और स्कर्ट-दोनों पहनावे ही ठीक नहीं हैं। सबसे बेहतर पहनावा शर्ट पैंट होना चाहिए। उनका कहना है कि पहनावा कुछ भी हो, यात्रियों को यह जानना जरूरी है कि ये महिलाएं कोई मोम की दिखावटी गुड़िया ही नहीं हैं, उनकी जीवन रक्षक हैं।

कई बार खराब मौसम में जब विमान फंसता है तो यात्री घबरा जाते हैं और कुछ तो रोने लगते हैं, ऐसे में क्या कभी उन्होंने यह देखा है कि कैबिन क्रू के सदस्य किस तरह खुद को शांत रखते हुए उनकी मदद करते हैं।
लगातार हवाई यात्रा का एयर होस्टेस के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। पानी की कमी, खुश्की, सोने-उठने के समय में गड़बड़ी (डिस्टरबेंस ऑफ बायोलॉजिकल क्लॉक), जेट लेग आदि से उनके स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। उड़ता हुआ विमान यूं भी बीमारी का चैंबर होता है, क्योंकि ताजा हवा के लिए कोई रास्ता न होने के कारण तमाम लोगों की सांस विशेष रूप से बीमार मरीजों की सांस से कई तरह की बीमारियां फैलने का खतरा बना रहता है।

इन महिला विमान कर्मियों को पारिवारिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। लगातार बच्चों और पति से दूर रहना, बच्चों की फीस और तमाम बिल जमा करने जैसे घरेलू कामों की पूर्व योजना तैयार करना इनकी मजबूरी है। यह भी इनकी मजबूरी है कि अपनी बात रखने के लिए इनकी कोई अलग यूनियन नहीं है। इसी वजह से अक्सर इनकी शिकायतों पर सही तरीके से गौर नहीं किया जाता और उल्टे इन्हें ही दोषी ठहरा दिया जाता है। लेकिन एक अन्य एयर होस्टेस का कहना है कि कुछ महिलाकर्मी निजी स्वार्थ की सिद्धी के लिए झूठे आरोप भी लगाती हैं, पर ऐसा कम ही होता है। कई बार ऐसा भी हुआ है कि गलतियां दोनों ओर से हुई हैं।

कुछ महिलाएं यात्रियों से भी करीबी गांठने से बाज नहीं आतीं। उनका कहना है कि ऐसा सिर्फ इस पेशे में ही नहीं, हर पेशे में होता है। फिर भी इन व्योमबालाओं की समस्याएं इसलिए भी बड़ी हैं, क्योंकि इन्हें सब कुछ स्पेस में झेलना पड़ता है।

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