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मिथिला की बेटी का कर्म

मिथिला की बेटी का कर्म

पूनम आजाद ने 1992-93 में कर्मा नामक एक गैर सरकारी संगठन बनाया था और आज वह इस संगठन के जरिए गरीब मजदूर महिलाओं व उनके बच्चों को तमाम तरह के प्रशिक्षण देकर न केवल रोजगार दिलवा रही हैं, बल्कि उन्हें उनकी नई पहचान से भी वाकिफ करा रही हैं।

एक जमाने के मशहूर क्रिकेटर और भाजपा नेता कीर्ति आजाद की पत्नी पूनम आजाद ने उनसे अलग अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाई है। दिल्ली की झुग्गी-बस्तियों में रहने वाली गरीब मजदूर औरतों के लिए कुछ करने की इच्छा से पूनम आजाद ने 1992-93 में ‘कर्मा’ नामक एक गैर सरकारी संगठन की शुरुआत की। पूनम ने देखा कि इन औरतों के पास क्षमताएं तो हैं, पर उनके सामाजिक-आर्थिक हालात ने उन्हें कभी पनपने नहीं दिया। सो पूनम ने इन्हें सहारा देने का फैसला किया। जरा से सहारे और प्रशिक्षण के बलबूते ये महिलाएं आज न केवल अपने पैरों पर खड़ी हैं, बल्कि घरेलू कामगार, ब्यूटीशियन, आया और टीचर के रूप में सम्मानजनक जीवन जी रही हैं।

पूनम आजाद ने ‘कर्मा’ के जरिए न केवल महिलाओं, बल्कि गली-मोहल्लों में धूल-मिट्टी में खेलते उनके बच्चों का जीवन संवारने का काम भी किया है। पूनम ने इन बच्चों को क्रिकेट और कबड्डी जैसे खेलों में प्रशिक्षित करके उन्हें राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पंहुचाने का कार्य भी कर्मा के जरिए बखूबी अंजाम दिया है।

दरभंगा जिले में जन्मी पूनम को लोग वहां ‘मिथिला की बेटी’ कह कर बुलाते हैं। बिहार के इस जिले के दूर-दराज के गांवों में संसाधनों व संचार माध्यमों का नितांत अभाव है। यही वजह है कि यहां की औरतों की स्थिति शहरी गरीब महिलाओं से भी बदतर है। वे रोज शारीरिक व मानसिक हिंसा की शिकार होती हैं, पर उन्हें मालूम ही नहीं कि यह अत्याचार है और इसके खिलाफ आवाज कैसे उठाई जाए। वे आर्थिक व सामाजिक रूप से शहरी महिलाओं के मुकाबले काफी कमजोर हैं। यही वजह है कि पूनम ने न केवल दिल्ली, बल्कि बिहार के इन गांवों की औरतों के लिए भी काम करने का निश्चय किया। उन्होंने इनके मन में विश्वास की ज्योति जलाई और उन्हें प्रशिक्षित करके नौकरियां व स्व-रोजगार प्राप्त करने में सहायता की।

पूनम का कहना है,"माना कि औरतें आज आत्मनिर्भर हो रही हैं, पर उनकी चुनौतियां और बढ़ गई हैं। एक ओर तो उन्हें घर-परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी उठानी है तो दूसरी ओर समाज में अपनी पहचान बनाने की लड़ाई भी लड़नी है। आप मेरा ही उदाहरण ले लीजिए। कीर्तिजी किसी दौरे पर जाते हैं तो निश्चिंत होकर जाते हैं कि घर की देखभाल करने के लिए तो मैं हूं ही। पर मैं जब संस्था के किसी काम या राजनीतिक दौरे पर जाती हूं तो पहले यह सुनिश्चित करना होता है कि मेरे पीछे से घर की व्यवस्था भली-भांति सुचारू रूप से चले। बच्चों को और कीर्तिजी को किसी प्रकार की परेशानी न हो।"

हाल ही में एयर इंडिया की फ्लाइट आईसी 884 की एयर होस्टेस कोमल के साथ उसके कमांडर द्वारा किए गए यौन उत्पीड़न के खिलाफ उन्होंने अपनी आवाज बुलंद की है। यह अकेला मामला नहीं है, जिसमें वह औरतों पर होने वाली हिंसा के खिलाफ खड़ी दिखाई दी हैं। अपनी संस्था के माध्यम से वे लंबे समय से औरतों के साथ होने वाली हिंसा के खिलाफ बोलती आई हैं। औरतों के साथ होने वाली हिंसा के लिए पूनम व्यवस्था को जिम्मेदार मानती हैं। वे कहती हैं कि कोमल के साथ ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि फ्लाइट में बैठे किसी भी पैसेंजर ने उसका साथ नहीं दिया। हमारे आसपास औरतों के साथ सरेआम छेड़खानी होती रहती है और पीड़िता का साथ कोई नहीं देता। अगर आसपास के लोग अपनी जिम्मेदारी समझ कर महिला की मदद करें तो काफी हद तक इस समस्या से निपटा जा सकता है। हम अधिकार की बात तो खूब करते हैं पर अधिकार के साथ कर्तव्य पालन की जिम्मेदारी भी तो हमें लेनी चाहिए।

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