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कीमतों का गोरखधंधा

थोक मूल्य सूचकांक के हिसाब से देखें तो महंगाई की दर घटते हुए 2.43 फीसदी पर आ गिरी है। लेकिन दुर्भाग्य से देश का आम आदमी थोक बाजार में खरीदारी नहीं करता। उसे नोन-तेल और लकड़ी खरीदने के लिए फुटकर बाजार में जाना पड़ता है और फुटकर कीमतों की तस्वीर दिखाने वाला उपभोक्ता मूल्य सूचकांक बढ़ते हुए 10.45 फीसदी पर पहुंच गया है। सरकार और मीडिया दोनों चूंकि थोक मूल्य सूचकांक को लेकर ही ज्यादा चिंतित रहते हैं, इसलिए न सिर्फ महंगाई घटने पर संतोष जताया जा रहा है, बल्कि इस पर बहस शुरू हो गई है कि मूल्यह्रास यानी डिफ्लेशन की स्थिति आ गई तो उससे कैसे निपटा जाएगा। सवाल यही है कि क्या वास्तव में महंगाई की दर इस कदर गिर गई है? अगर हां, तो अर्थशास्त्र की किस प्रक्रिया ने चीनी का रिटेल दाम 25 रुपये किलो कर डाला है? क्या वजह है कि रिफांइड ऑयल और टमाटर के भाव किसी सूरत उपभोक्ता को आराम पहुंचाते नजर नहीं आते? ऐसा ही विरोधाभास र्का बाजार में भी नजर आ रहा है। आए दिन ब्याज दर घटने की घोषणा सुर्खियों में छप रही है, लेकिन जब कोई होम लोन या पर्सनल लोन लेने बैंक पहुंचता है तो बिल्कुल अलग हकीकत सामने आती है। इक्का-दुक्का बैंकों को छोड़कर सभी महीनों पुरानी ऊंची ब्याज दरों पर अडिग हैं। आंकड़ों और हकीकत का यही अंतर है कि आम उपभोक्ता और इंडस्ट्री दोनों ने करो से मुंह मोड़ा हुआ है। बैंकों के क्रेडिट टेकऑफ के उदासीन आंकड़े और उत्पादन सूचकांक के रुझान इसके गवाह हैं। जनवरी में भी सिकुड़न की खबर लाने वाला औद्योगिक उत्पादन सूचकांक अर्थतंत्र के इसी विरोधाभासी पहलू की बानगी है। ऐसे माहौल में प्रोत्साहन पैकेा बेअसर रहने को अभिशप्त होते हैं। रिार्व बैंक अपनी सारी कसरत के बावजूद मुद्रातंत्र में लहर पैदा नहीं कर पा रहा है तो इसे अर्थतंत्र में विश्वास की कमी ही कहा जाएगा। सरकार चाहे तो इस खुशफहमी में रह सकती है कि इस बार महंगाई चुनाव के मुख्य मुद्दे के रूप में नही उभरगी। लेकिन मंदी और छंटनी के दर्द के साथ-साथ ये तमाम विरोधाभास भी वोटर के अवचेतन मेंकहीं न कहीं दर्ज हैं और कोई नहीं जानता कि वे चुनाव के ऊंट को किस करवट बैठने को मजबूर कर दें।ं

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