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सुंदरता की उलझन

सुंदरता की उलझन

अभी पिछले दिनों एचटी लीडरशिप समिट के दौरान करीना कपूर ने जब यह कहा कि वे बॉडी की वजह से नहीं, बल्कि वर्क ऑफ बॉडी की वजह से अपने वर्तमान मुकाम पर पहुंची हैं तो दरअसल वे औरत के लिए सुंदरता को एक अपरिहार्य योग्यता बनाए जाने की स्थिति का ही विरोध कर रही थीं।

बॉलीवुड और छोटे परदे पर अगर गंभीरता से नजर डाली जाए तो आगे बढ़ने का पहला पैमाना सुंदरता ही माना जाता है, कम से कम लड़कियों के लिए। कहा भी जाता है कि अगर आप सुंदर हैं तो रफ्ता-रफ्ता अभिनय भी सीख ही जाएंगी। इस बात को साबित करने वाली तमाम नायिकाएं ऐसी हैं, जिन्हें पहले अपनी सुंदरता के लिए जाना गया। इसी सुंदरता के आधार पर उन्हें काम भी मिलता रहा। दिलचस्प बात है कि उनके अभिनय की बजाय उनकी सुंदरता की ही ज्यादा चर्चा हुई। आज भी बड़े या छोटे परदे पर काम मिलने की पहली शर्त सुंदरता को ही माना जाता है।

यों देखा जाए तो सुंदरता से भला किसे विरोध हो सकता है? लेकिन क्या सुंदर सिर्फ औरत को ही होना चाहिए, मर्द को नहीं? सुंदर दिखने की चेष्टा औरतों में जितनी दिखती है, उतनी पुरुषों में क्यों नहीं? समय बहुत बदला है, पर किस रूप में बदला है, देखना हो तो आज के तमाम विज्ञापनों को देख लीजिए (चाहे वे टीवी पर हों, नेट पर हों या प्रिंट में हों)। टीवी के तमाम धारावाहिकों, मुंबइया फिल्मों को ही नहीं, समाचार कार्यक्रमों सहित अपने घर-पड़ोस से लेकर ऑफिसों तक की घटनाओं या व्यवहारों पर गौर कीजिए। हर जगह औरतों की मुख्य चिंताओं, गतिविधियों और पुरुषों के उनसे डिमांड और रिलेशन की पारस्परिकता को परखने की कोशिश करेंगे तो आपको औरत की एक बनती या बनाई जाती हुई छवि मिलेगी और इस छवि के पीछे या आगे ‘फेयरनेस ड्राइव’ एक अहम भूमिका में होगी।

समय बदला है और औरत घर की देहरी लांघ कर बाहर की दुनिया में बड़े आत्मविश्वास के साथ दाखिल होने की कोशिश कर रही है। वह सामंती पुरुष सत्तात्मक प्रतीकों को झटकने की भी कोशिश कर रही है। बाजार के इस युग में चीजों को बेचने में या बनाने में भी वह एक बड़ा रोल अदा कर रही है, मगर क्या है कि वह अपनी सुंदर दिखने की छवि और चिंता से निकल नहीं पा रही है? अभी भी स्त्री हर कीमत पर सुंदर दिखना चाहती है और पुरुष उसे हर कीमत पर सुंदर देखना चाहता है। बाजार इसी असली नस को पकड़ कर औरत का अपनी तरह से इस्तेमाल कर रहा है और भरपूर इस्तेमाल कर लेना चाहता है। शायद बदलते समय का कुछ अंदेशा बाजार को भी है कि क्या पता कल को तेजी से आगे बढ़ती औरत सचमुच न बदल जाए।

यह अनायास नहीं है कि नहाने-धोने के अधिकांश विज्ञापन स्त्री का ही किसी न किसी रूप में दोहन करने में लगे हैं (और इन विज्ञापनों का खासा असर घर-समाज में औरत की छवि और पुरुषों की मानसिकता पर पड़ता तो है ही)। इन विज्ञापनों में अगर पुरुष कहीं है भी तो उसके चेहरे पर न कोई चिंता है, न हड़बड़ी। काफी सुकून है। और औरत चेहरे से लेकर कपड़े तक की सफाई और सुंदरता के लिए न सिर्फ चिंतित है, बल्कि हड़बड़ाई हुई भी है। सवाल उठता है कि औरत के साथ ऐसा क्यों है? उसकी यह चिंता स्वाभाविक है या प्रेरित? यह नहीं माना जा सकता कि सुंदर दिखने की चाह सिर्फ औरत में ही हो और मर्द में हो ही नहीं।

अगर मर्द सुंदर नहीं दिखना चाहते तो हर गली में आए दिन मैंस ब्यूटी पार्लरों की संख्या क्या वैसे ही बढ़ रही है? दरअसल सुंदरता तो सुरुचि का मामला है, सुंदर होने या सुंदर दिखने की कोशिश में वैसे कोई बुराई भी नहीं है, पर औरतों के मामले में यह सिर्फ सुरुचि या स्वेच्छा का ही मामला नहीं है। यह कई स्तरों पर होने वाले भेदभाव से जुड़ा है। पर वह सवाल थोड़ा-सा अलग है। यहां सुंदरता का जो सवाल है, उसमें  इस आधार पर खास अपनों या अपनों-जैसों से भी भेदभाव और अन्याय की स्थितियां बनती हैं। अपने साथ काम करने वालों से इस आधार पर संबंधों और बर्ताव का फर्क पैदा हो जाया करते हैं और इसकी शिकार खास तौर पर औरत ही होती है।

ऐसा मामला कम देखा गया है कि सिर्फ सुंदर न दिखने की वजह से किसी पुरुष को कोई नौकरी या प्रोन्नति न मिली हो, पर औरतों के मामले में यह कोई अनहोनी बात नहीं है। बॉलीवुड तो इसका बड़ा उदाहरण है ही, मीडियों चैनलों तक को देखिए। सुंदर औरतें ही वहां भी हावी हैं। मीडिया समाज और सिनेमा की जिन औरतों को सिलेब्रिटी बना रहा है, उनका भी मुख्य आकर्षण सुंदरता ही है। औरतों के लिए सुंदरता एक अनिवार्य योग्यता का दर्जा हासिल किए हुए है। लिहाजा करीना कपूर जब उपरोक्त बयान देती हैं तो शायद वह इसी स्थिति का विरोध करती दिखाई देती हैं।                                                                                    

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