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मरीज नहीं, मर्ज का इलाज कीजिए

महाराष्ट्र की कानून-व्यवस्था क्या राज ठाकरे और उनकी उद्दंड टोली की बंधक बन गई है? वे अब तक निरीह छात्रों या हिंदी भाषी कामगारों पर सड़कों पर गुस्सा उतारा करते थे। सोमवार को तो इन्तहा ही हो गई। समाजवादी पार्टी के नवनिर्वाचित विधायक अबू आसिम आजमी ने जैसे ही हिंदी में शपथ लेनी शुरू की, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के विधायकों ने उन पर हमला बोल दिया। समय आ गया है। इस आंधी को अब यहीं नहीं रोका गया तो यह आज नहीं तो कल जानलेवा तूफान बन जाएगी। तमाचा आजमी के गाल पर नहीं बल्कि हर हिंदी भाषी के स्वाभिमान और हिंदुस्तान के संविधान की मूल भावना पर पड़ा है।

क्या तमाशा है? राज ठाकरे ने पहले ही घोषणा कर दी थी। यदि कोई हिंदी में शपथ लेने की कोशिश करेगा तो परिणाम भुगतेगा। हिंदी देश की राष्ट्रभाषा है। सर्वाधिक लोग इसे बोलते-समझते हैं। यह इसकी गुणवत्ता ही है कि अहिंदी भाषी प्रदेशों में भी हिंदी को चाहने वाले तेजी से पनप रहे हैं। जिस पंजाब समस्या की जड़ में कभी हिंदी और पंजाबी का वैमनस्य भी एक वजह हुआ करता था, वहां आज हिंदी के अखबार पंजाबी समाचार पत्रों से कहीं ज्यादा बिकते हैं। जम्मू-कश्मीर की राजभाषा उर्दू है पर वहां भी हिंदी के अखबारों ने परचम गाड़ रखे हैं। क्यों? इक्कीसवीं शताब्दी का लगभग एक दशक जी चुके लोग जानते हैं कि अपनी भाषा यदि मां की तरह होती है तो अन्य भाषाएं मौसियों का दर्जा रखती हैं। हमारा देश विभिन्न भाषाओं, संस्कारों, परंपराओं और विचारों की कुनबाई एकता का प्रतीक है। यह गजब की थाती किसी और राष्ट्र-राज्य के हिस्से में नहीं है। राज ठाकरे कौन होते हैं, इस हजारों साल पुरानी विरासत को तोड़ने वाले?

कुछ जरूरत से ज्यादा आशावादी लोग इसे चाय के प्याले का उफान मान कर चुप बैठने की सलाह देते हैं। ये वे तर्कशास्त्री हैं, जो सीना फुलाकर कहते हैं कि पंजाब की समस्या अपने आप दम तोड़ गई। कश्मीर में अमन की वापसी का रास्ता साफ हो गया है। वहां चिनार अब गर्मियों में अकेले नहीं होते। पूरे देश के सैलानी उनके इर्द-गिर्द आजादी से मंडराते हैं। यहीं सवाल उठता है कि क्या पंजाब और कश्मीर की तरह हम अलगाववाद के शोलों को पहले बुलंद होने दें और फिर उनके बुझने का इंतजार करें? आरोप लगते रहे हैं। हम हिंदुस्तानियों में इतिहासबोध का अभाव है। ठाकरेनामा इसका जीता-जागता उदाहरण है। किसी सिकंदर, किसी चंगेज खां या अंग्रेजों के आक्रमणों से हमने कोई सबक नहीं लिया तो उसे पुराना मानकर अनदेखा किया जा सकता है। पंजाब और कश्मीर के जख्म तो अभी भी रिस रहे हैं। रिसते ज़ख्मों की उपेक्षा कैं सर को जन्म देती है। 

फौरी तौर पर हमलावर विधायकों को चार साल के लिए सदन से निलम्बित कर दिया गया है। मनसे और उनके विपक्षी इसे राजनीति का भुनाऊ मुद्दा बनाने की कोशिश करेंगे। इसीलिए यह मर्ज का नहीं मरीज का इलाज है। जब एक बीमारी नजरों के सामने पनप रही हो तो हमें उस पर चीरा लगाने से चूकना नहीं चाहिए। महाराष्ट्र के हुकमरानों को तय करना है कि वे सजर्री की तिथि कब तय करते हैं? बीमारी के बेकाबू होने से पहले या बाद में?

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  • Web Title:मरीज नहीं, मर्ज का इलाज कीजिए