DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

परम सत्य की खोज

इस विराट विश्व-ब्रह्माण्ड के मध्यमणि हैं पुरुषोत्तम। प्रत्येक पारमाणविक संरचना के एक केन्द्रबिंदु के चारों ओर अजस्त्र विद्युत अणु घूमते हैं। इसी तरह हम लोगों के इस पार्थिव चक्र का केन्द्रबिन्दु है यह पृथ्वी, और उसके चारों ओर चन्द्रमा घूम रहा हैं। सौर चक्र में सूर्य केन्द्रबिंदु है, और उस सूर्य के चारों ओर घूम रहे हैं अनेक ग्रह। वैसे ही विश्व संरचना के मध्यमणि हैं पुरुषोत्तम और उनके चारों ओर घूम रहे हैं अजस्त्र सत्ता, और अजस्त्र संरचना।
   
इस विश्व सृष्टिधरा का एक अपना वैशिष्ट्य है। अन्यान्य संरचना के क्षेत्र में केन्द्रबिंदु के चारों ओर जो घूमते हैं, वे परिदृश्यमान जगत् के मध्य ही घूमते हैं, किन्तु सृष्टि की गतिधारा केवल भौतिक क्षेत्र में ही सीमाबद्घ नहीं है, वह मानस जगत के क्षेत्र में भी प्रयोज्य है। अर्थात् बात यह है कि विश्व सृष्टि संरचना में समस्त जीव जगत् परम पुरुष के चारों ओर घूम रहा है, मानसिक रूप में भी कोई यह ज्ञात रूप में करता है, कोई अज्ञात रूप में कर रहा है।

जो इस तरह ज्ञात रूप से उनके चारों ओर घूम रहे हैं, नृत्य करते चल रहे हैं, वे वास्तव में भाग्यवान हैं। अनेक उनके चारों ओर घूम रहें हैं, अज्ञात रूप में, बिना समङो-बूङो। यह जो परम पुरुष के चारों ओर घूमना है यह जो जान नहीं पाते हैं, वे स्थूल मानस आभोग के प्रभाव के कारण। और इसके फलस्वरूप सृष्टि के मध्यमणि से उनके व्यासगत दूरत्व बढ़ता चलता है, और कभी-कभी उनके बीच का व्यवधान कम भी हो जाता है, जब उनकी अज्ञानता वश यह दूरत्व बढ़ जाता है, उनके क्लेश की मात्र भी बढ़ जाती है, और जब दूरत्व कम हो जाता है तब उनकी सुखानुभूति बढ़ जाती है।
   
अन्यान्य केन्द्र बिंदुओं के क्षेत्र में जो चल मानता है, वह सिर्फ भौतिक जगत् में है। इसलिए प्रत्येक जीव के साथ परमागति के सन्तुलन को कायम रखकर ही चलना उचित है। यही है परम सत्य की खोज।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:परम सत्य की खोज