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समृद्धि का लोकतंत्र

चीन की तरक्की से अभिभूत दुनिया और भारत के पढ़े-लिखे लोगों को यह जानकार हैरानी होगी कि परंपरा से हट कर किए गए समृद्धि के आकलन में भारत चीन से काफी आगे है। लंदन के लिगेटम संस्थान के समृद्धि सूचकांक में भारत का नंबर 45 वां तो चीन का नंबर 75 वां है। यह आकलन उन तमाम स्थापित मान्यताओं को खारिज करता है, जो विश्व आर्थिक फोरम और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रपटों के आधार पर बनाई जाती हैं।

विश्व आर्थिक फोरम की जो रपट दिल्ली में चल रही इंडिया इकॉनमिक फोरम की बैठक में रखी गई है, उसमेंभी 133 देशों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में चीन 29 वें और भारत 49 वें नंबर पर है। लेकिन लिगेटम समृद्धि सूचकांक ने अध्ययन के लिए तमाम अन्य कारकों पर जोर दिया है। यह वे कारक हैं, जिनका आर्थिक आंकड़ेबाजी से ज्यादा मनुष्य के जीवन की गुणवत्ता से वास्ता है।

इस सूचकांक के तहत सन् 2007 और 2008 में भारत चीन से आगे नहीं था। लेकिन 2009 में जब अध्ययन के कारक बदले गए तो भारत गर्वनेस, निजी स्वतंत्रता और सामाजिक पूंजी के मामले में चीन से बहुत आगे निकल गया। इस अध्ययन ने चीन के साम्यवाद का वह मिथक तोड़ दिया है, जिसके अनुसार कम्युन के आधार पर बने समाजों में ज्यादा पारस्परिक सहयोग होता है। इसके विपरीत यह भी धारणा बनी है कि भारत के धर्म, जाति और भाषा के आधार पर बंटे समाज में भी चीन के समरूपी समाज से ज्यादा सहयोग है। जनता के नाम पर बना चीन का साम्यवाद बिजनेस पर ज्यादा ध्यान देता है। 

इस अध्ययन का मतलब यह नहीं है कि भारत इस रपट को लेकर इतराता रहे और अपना पिछड़ापन दूर करने की कोशिश रोक दे। क्योंकि इसी रपट के अनुसार शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के मामले में चीन काफी बेहतर है। वास्तव में यह रपट चीन की समृद्धि के उस हौवे को तोड़ती है, जिसके चलते भारत के सेना प्रमुख से लेकर उद्यमी, राजनेता और बुद्धिजीवी सभी एक तरह का हीनता बोध पाले घूम रहे हैं। चीन की तानाशाही उसकी अर्थव्यवस्था को बेहतर भले बना रही हो लेकिन जनता की स्थिति को खराब रखे हुए है। वहां बाजार को भले आजादी नसीब हुई हो पर जनता अभी उसके लिए छटपटा रही है। जबकि भारत में जनता की आजादी के साथ-साथ बाजार और आर्थिक गतिविधियां आजादी प्राप्त कर रही हैं। दीर्घकाल में भारत की यही लोकतांत्रिक समृद्धि उसे और आगे ले जाएगी।  

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