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मिट्टी तेल की कालाबाजारी दूर हो

मिट्टी का तेल पूरे देश में केवल निर्धारित दुकानों के माध्यम से निश्चित मात्र में राशन कार्ड धारकों को सब्सिडाइज्ड मूल्य पर (9.50 रु. प्रति लीटर) उपलब्ध कराया जाता है। और जो उपभोक्ता इस तेल को राशन की दुकान से प्राप्त करते हैं, मुहल्ले में परचूनिया/पेठी डीजल डीलर अथवा अन्य उपभोक्ता को 22 से 25 रु. लीटर की दर से बेच देते हैं तथा ये छोटे विक्रेता, बड़े उपभोक्ताओं को 30 रु. लीटर की दर से बचेते हैं। अर्थात वास्तविक उपभोक्ता तक मिट्टी का तेल 30 रु. प्रति लीटर की दर से पहुंच रहा है। ये उपभोक्ता हैं जेनेरेटर अथवा इंजन धारक। जिन निर्धन लोगों का ख्याल करके सरकार ने सब्सीडाइज्ड मिट्टी तेल की बिक्री करा रही है, ऐसे उपभोक्ता देश में एक प्रतिशत भी नहीं हैं। मैं सरकार से अनुरोध करना चाहता हूं कि मिट्टी तेल से सब्सिडी समाप्त कर इसकी बिक्री वास्तविक मूल्य पर ही करें।
मधुसूदन गर्ग, भादला रोड, देवबंद

प्रभाष जी को श्रद्धांजलि
तुल चले जाओगे..तो सोचेंगे..
हमने क्या खोया..हमने क्या पाया।
प्रसिद्ध गजल गायक जगजीत सिंह की उपर्युक्त पंक्तियां वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी के निधन का समाचार सुनते ही स्मरण हो आईं। सचमुच! आधुनिक पत्रकारिता के भीष्म पितामह कहे जाने वाले प्रभाष जोशी का हमारे बीच से अचानक यूं चला जाना किसी सदमें से कम नहीं है। आज उस युगद्रष्टा का हमारे बीच न होना हमें आघात
पहुंचाता है। आज पत्रकारिता जिस राह पर चल पड़ी है, वहां ऐसी बातें करने वाले पत्रकार अंगुलियों पर गिने जा सकते हें।
संतोष सिंह, पटेल चेस्ट, दिल्ली

ठगी गई जनता
राजधानी दिल्ली के नागरिक इन दिनों महंगाई की मार से बुरी तरह से त्रस्त हैं। अभी हाल ही में आटा, तेल, चीनी, दूध व किरायों में बेतहाशा वृद्धि के चलते आम आदमी का यहां रहना कठिन हो गया है। कांग्रेस की सरकार ने चुनाव से पूर्व महंगाई घटाने का वायदा किया था। लोग झांसे में आ गए। जीत के बाद जिस प्रकार से जनता को ठेंगा दिखाया है और हर वस्तु के दाम बढ़ाए हैं, इससे आम जनता अपने आप को ठगा सा महसूस कर रही है।
वीरेन्द्र सिंह जरयाल, शिवपुरी विस्तार, कृष्णनगर, दिल्ली

मातृभाषा की दुर्दशा
हिन्दी हमारी मातृभाषा है और अधिकतर उत्तर भारतीय हिन्दी भाषी हैं। परंतु जो भाषा हम बोलते, सुनते व पढ़ते हैं, क्या वह हिन्दी भाषा है? कदाचित नहीं। बोलचाल में अंग्रेजी के अधिक से अधिक शब्दों का प्रयोग उच्च शिक्षित, उच्चसंस्कृत व उच्च सभ्य समझा जाता है। इसके लिए संचार माध्यम अधिक जिम्मेदार हैं। यदि हिंदी भाषा की यही गति रही तो दुर्गति होने में अधिक समय नहीं। हिन्दी अकादमी इस विषय में आंखों पर पट्टी व कानों में तेल डाले सोई हुई है। अभी भी समय है, चेत जाओ, अन्यथा हिन्दी भाषा तेजी से विलुप्त होने वाली भाषाओं की सूची में सम्मिलित हो कर रह जाएगी।
सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी, दिल्ली

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