DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

भागलपुर दंगा 1989- एक और सजा

भागलपुर दंगे के दौरान कोतवाली (तातारपुर) आशानंदपुर निवासी 15 वर्षीय मो. कयूम की गोली मारकर हत्या कर लाश गायब करने के मामले में शुक्रवार को सप्तम अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविन्द माधव ने आरोपित कामेश्वर यादव को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।  कोर्ट ने 6 नवंबर को कामेश्वर यादव को दोषी करार दिया  था।  इसके पूर्व भी कामेश्वर यादव को दंगा के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा चुकी है।

कामेश्वर यादव को जिस मामले में कोर्ट ने सजा सुनाई है पुलिस ने पहले उसमें फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी। मगर बाद में अनुसंधान के बाद कोर्ट में आरोप पत्र समर्पित किया था जिसकी सुनवाई के पश्चात कोर्ट ने सजा सुनाई है। बहस के दौरान अभियोजन पक्ष से दंगा कांड के विशेष लोक अभियोजक मो. अतिउल्लाह और बचाव पक्ष से अभय प्रसाद उपस्थित थे। फैसले के दौरान कोर्ट परिसर में सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था की गई थी। फैसला सुनाने के बाद कामेश्वर यादव के समर्थकों ने कोर्ट परिसर में नारेबाजी की। परबत्ती चौक पर भी समर्थकों ने हंगामा किया। स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। दुकानें बंद हो गई है।

सोमवार की शाम 4.05 बजे कामेश्वर यादव को हाजत से कोर्ट में प्रस्तुत किया गया। अभियोजन पक्ष ने कड़ी से कड़ी सजा देने देने का अनुरोध किया वहीं बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने कम से कम सजा देने की प्रार्थना की। दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कामेश्वर यादव को भादवि की धारा 148 के तहत तीन साल, 302/ 149 के तहत आजीवन कारावास और पांच हजार रुपए अर्थदंड की सजा सुनाई।

अर्थदंड की राशि नहीं देने पर अभियुक्त को छह माह की अतिरिक्त सजा काटनी पड़ेगी। कोर्ट ने 364/ 149 के तहत पांच साल और दो हजार रुपए अर्थदंड की सजा सुनाई, अर्थदंड की राशि नहीं देने पर तीन माह की अतिरिक्त सजा काटनी पड़ेगी। भादवि की धारा 201/ 149 के तहत पांच साल और दो हजार रुपए अर्थदंड की सजा सुनाई गई। अर्थदंड की राशि नहीं देने पर तीन माह की अतिरिक्त सजा काटनी पड़ेगी।  27 आर्म्स एक्ट के तहत तीन साल और दो हजार रुपए अर्थदंड की सजा सुनाई गई। अर्थदंड नहीं देने पर तीन माह की अतिरिक्त सजा काटनी पड़ेगी। कोर्ट ने कहा है कि सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी।

घटना  24 अक्टूबर 1989 की है। प्राथमिकी कयूम के पिता नसीरुद्दीन ने दर्ज कराई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार 24 अक्टूबर 1989 को करीब 3 बजे नसीरुद्दीन घर में था। तभी करीब दो सौ की भीड़ एक समुदाय को गाली-गलौज और बम मारते हुए आशानंदपुर लेन बाग में उनके मकान के नजदीक गली में घुसी। हल्ला सुनने पर घर से निकले तो देखा कि दंगाइयों ने उनके बेटे कयूमउद्दीन को पकड़ लिया। कामेश्वर यादव ने गोली मारी जो कयूम को लगी।

बेटा को बचाना चाहा तो भीड़ द्वारा फायरिंग की जाने लगी। भीड़ कयूम को खींचकर अपने साथ लेती गई। इस मामले में तत्कालीन डीआईजी गिरिजानंद प्रसाद और इंस्पेक्टर जावेद महबूब सहित 9 लोगों की गवाही हुई। फैसला सुनने के लिए लोग कोर्ट परिसर में सुबह से जमे हुए थे। कोर्ट परिसर में मजिस्ट्रेट और अतिरिक्त पुलिस की व्यवस्था की गई थी। कोर्ट में वकीलों के अलावा किसी को प्रवेश नहीं करने दिया गया। दंगे के एक मामले में 27 नवम्बर 2007 को भी कामेश्वर यादव को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:भागलपुर दंगा 1989- एक और सजा