DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

उलेमा के चेहरे पर झलक रही एक तरफा दबाव की पीड़ा

वंदेमातरम् के गायन को लेकर फतवे पर मचे बवाल के बाद अब उलमा के चेहरे पर यह सवाल भी है। आखिरकार हर बार बात घूम-फिरकर दारुल उलूम की तरफ ही क्यों मुड़ रही है? जो लोग विरोध कर रहे हैं, उन्हें भी समझाने की जरूरत है। अब भले रामदेव हों या रविशंकर, पुतले फूंकने वालों को भी क्यों नहीं समझाते। यह भी उनका ही फर्ज है। रही बात फतवों की तो वह तो शरीयत की रोशनी में दिए गए जवाब हैं। उनका पालन करना या न करना व्यक्ति का जातिगत फैसला है।

दारुल उलूम के तंजीमों तरक्की विभाग के नायब प्रभारी अशरफ उस्मानी बेलागी से कहते हैं कि, लम्बी दाढ़ी रखना, पाबंदी के साथ नमाज पढ़ना, टोपी ओढ़ना, रोजे रखना आदि अनेक ऐसे मामले हैं जिनका आमतौर से मुसलमान सख्ती से या हूबहू पालन नहीं करते लेकिन कोई किसी को रोकता-टोकता नहीं है।

वंदेमातरम् के फतवे पर उलमा काफी कुछ हद तक स्थिति स्पष्ट कर चुके हैं। उलमा का कहना है कि संस्था की ओर से जारी किये जाने वाले फतवे उलमा या मुफ्तियों की व्यक्तिगत राय नहीं होते। बल्कि विद्वान मुफ्ती पूछे गये सवालों का शरीयत की रोशनी में खूब सोच-समझकर जवाब देते हैं। कोई इन फतवों का पालन करता है अथवा अनदेखी करता है इसकी कोई जिम्मेदारी संस्था की नहीं होती है।

उस्मानी का कहना है कि, वंदे मातरम् को लेकर श्री श्री रविशंकर की व्याख्या से उलेमा सहमत नहीं है। दरअसल,शरई एतबार से मुसलमानों के लिए अल्लाह के अलावा अन्य किसी की इबादत करना जायज नहीं है। फतवों को मानना बाध्यकारी नहीं होता है। भारत जैसे गैर इस्लामिक देश में यह इसलिए भी संभव नहीं है कि यहां फतवों को लागू कराने का कोई तंत्र मौजूद नहीं है।

मालूम हो कि, बीते रोज दारुल उलूम आए श्री श्री के समक्ष भी उलमा ने अपनी यह पीड़ा रखी थी कि, जब सुप्रीम कोर्ट भी आदेश दे चुका है कि, वंदे मातरम् गाने के लिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता तब भला यह दबाव क्यों? हिंदू संत या नेता वंदेमातरम् को मुद्दा बनाने वालों को समझाने का काम क्यों नहीं करते?

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:उलेमा के चेहरे पर झलक रही एक तरफा दबाव