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हिंदी भाषा को सार्थक बनाने की जरूरत है: साहित्यकार

देश के नामचीन हिन्दी साहित्यकारों और कथाकारों द्वारा राजधानी लखनऊ में साहित्यिक भाषा के अवमूल्यन को बचाने के लिए दो दिनों तक किए गए विचार मंथन में इस बात पर जोर दिया गया कि भाषा के अवमूल्यन को रोकने के लिए सार्थक प्रयासों की जरूरत है।

राजधानी में दो दिन चले कथाक्रम 2009 के विषय हिन्दी साहित्य और भविष्य का समाज  पर हुई चर्चा में कई वरिष्ठ साहित्यकारों और कथाकारों ने हिस्सा लिया और इसके समापन सत्र में वरिष्ठ कथाकार तथा मासिक हंस पत्रिका के संपादक राजेन्द्र यादव ने कहा कि साहित्य समाज से संवाद की संभावना तलाशने का उपक्रम है और समाज में नए विकल्प तलाशने होंगे।

उन्होंने साहित्य में भाषा के बदलते स्वरूप और हिन्दी पर अन्य भाषाओं के प्रभाव को भी हिन्दी के विकास के रूप में देखने की बात पर जोर दिया। वरिष्ठ आलोचक निर्मला जैन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि बौद्धिक जुगाली करने वाला लेखन अधिक समय तक टिका नही रह सकता और टिकेगा वही जो वृहत्तर समाज के लिए लिखेगा तथा सरल भाषा मे लिखेगा।

कथाकार वीरेन्द्र यादव ने इस अवसर पर कहा कि हिन्दी का अवमूल्यन चिंता का विषय है और आज सबसे बड़ी चुनौती जनतंत्र का सिकुड़ना है। उन्‍होंने कहा कि लोग कहीं न कही साहित्य से विमुख हो रहे हैं और साहित्यकारों को इस आहट को समझना होगा।

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