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बचपन में बुढ़ा'पा'! अब तक नहीं मिला प्रोजेरिया का तोड़

बचपन में बुढ़ा'पा'! अब तक नहीं मिला प्रोजेरिया का तोड़

दुनियाभर के वैज्ञानिक और बाल रोग विशेषज्ञ अत्यंत दुर्लभ बीमारी प्रोजेरिया का तोड़ ढूंढ़ने में लगे हैं, लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें अब तक सफलता नहीं मिल पाई है।

यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें शिशु अपने जीवनचक्र के दौरान बाल्यकाल, किशोरावस्था और युवावस्था के चरणों को पार कर वृद्धावस्था की तरफ अग्रसर होने की बजाय दो-तीन साल की उम्र में ही बुढ़ापे की तरफ बढ़ने लगता है और इस बीमारी की चपेट में आने वाले बच्चों का जीवन चक्र महज 13 से 21 साल की उम्र तक ही पूरा हो पाता है। प्रोजेरिया को हटचिंसन गिलफोर्ड सिंड्रोम भी कहा जाता है।

पहले लोग इस बीमारी से ज्यादा परिचित नहीं थे, लेकिन चार दिसंबर को रिलीज होने जा रही फिल्म पा ने लोगों में इस बीमारी के प्रति जानने की लालसा को बढ़ा दी है। पा में अमिताभ बच्चान ने प्रोजेरिया से पीड़ित बच्चे की भूमिका निभाई है।

यूनिवर्सिटी ऑफ आयोवा चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल में क्लिनिकल प्रोफेसर के रूप में कार्यरत जाने माने बाल रोग विशेषज्ञ डॉ रामनिवास शर्मा ने बताया कि वर्तमान आंकड़ों के अनुसार लगभग 40 लाख में से एक बच्चे में यह बीमारी पाई जाती है। उन्होंने कहा कि दुनियाभर के वैज्ञानिक और डॉक्टर इस बीमारी का इलाज ढूंढ़ने की कोशिश में लगे हैं, लेकिन अब तक कोई सफलता नहीं मिल पाई है।

यह बीमारी जीन्स और कोशिकाओं में उत्परिवर्तन की स्थिति के चलते होती है। इस बीमारी से ग्रसित अधिकतर बच्चे 13 साल की उम्र तक ही दम तोड़ देते हैं, जबकि कुछ बच्चे 20-21 साल तक जीते हैं।

रामनिवास ने बताया कि इस बीमारी के लक्षण दो-तीन साल की उम्र में ही उभरने लगते हैं। बच्चों के सिर के बाल उड़ जाते हैं, खोपड़ी का आकार बड़ा हो जाता है और नसें उभर कर त्वचा पर साफ दिखाई देती हैं। उसके शरीर की वृद्धि रुक जाती है। वह वृद्ध और काल्पनिक एलियन (दूसरे ग्रह के प्राणी) जैसा दिखने लगता है। उन्होंने कहा कि अब तक किए गए अनुसंधानों में इसका कोई कारगर इलाज नहीं ढूंढ़ा जा सका है।

रामनिवास ने कहा कि यदि प्रोजेरिया की जड़ पकड़ में आ गई तो न सिर्फ बीमारी का इलाज ढूंढ़ने में मदद मिलेगी, बल्कि इससे मनुष्य के बूढ़े होने की प्रक्रिया के भी कई राज खुलेंगे।

कम वजन के बच्चों को बचाने में अनुसंधान कार्य के लिए अमेरिका में पुरस्कृत किए जा चुके तथा ब्रिटेन के रॉयल कॉलेज ऑफ फिजीशियन के सदस्य डॉ रामनिवास ने बताया कि प्रोजेरिया का सबसे पहले उल्लेख 1886 में जोनाथन हटचिंसन ने किया था। बाद में 1897 में हेस्टिंग्स गिलफोर्ड ने भी इसका उल्लेख किया। इसलिए इस बीमारी को हटचिंसन गिलफोर्ड सिंड्रोम भी कहा जाता है।

वर्तमान में विश्व में प्रोजेरिया के 35-45 मामले हैं। भारत के मध्य प्रदेश में भी एक बच्चे को इस बीमारी से पीड़ित बताया जाता है।

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