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वर्ष 2010-11 में 7 फीसदी रहेगी वृद्धि दर: प्रणव

वर्ष 2010-11 में 7 फीसदी रहेगी वृद्धि दर: प्रणव

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने उम्मीद जताई है कि भारत की आर्थिक वृद्धि दर अगले वित्त वर्ष में 7 फीसदी से अधिक रहेगी और देश राजकोषीय मजबूती की ओर लौटेगा क्योंकि अधिक समय तक ऊंचा राजकोषीय घाटा जारी नहीं रखा जा सकता।

स्कॉटलैंड में जी-20 देशों के वित्त मंत्रियों की बैठक के बाद मुखर्जी ने बताया कि अगले वर्ष के लिए हमारा आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान सात फीसदी से अधिक का है।

चालू वित्त वर्ष के बारे में उन्होंने कहा कि देश की आर्थिक वृद्धि दर 6.5 फीसदी रहने की संभावना है जो बीते वित्त वर्ष के 6.7 फीसदी की वृद्धि दर के मुकाबले थोड़ी कम है। बढ़ते राजकोषीय घाटे पर सवालों का जवाब देते हुए मुखर्जी ने कहा कि वह पहले ही संसद को बता चुके हैं कि वर्ष 2009-10 के लिए प्रस्तावित जीडीपी का 6.8 फीसदी बजट घाटा लंबे समय में बरकरार नहीं रखा जा सकता।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2012 तक राजकोषीय घाटे को घटाकर 4 फीसदी तक और राजस्व घाटे को घटाकर 1.5 फीसदी तक लाने के प्रयास किए जाएंगे। मुखर्जी का बयान इस मायने में अहम है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी प्रोत्साहन पैकेज को 2010-11 में खत्म किए जाने की बात कही है।


मानसून के प्रभाव के बारे में वित्त मंत्री ने कहा कि देश के पास गेहूं एवं चावल का पर्याप्त बफर स्टॉक हैं और सरकार घरेलू आपूर्ति बढ़ाने के लिए आवश्यक जिंसों का आयात कर रही है।

रिजर्व बैंक द्वारा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 200 टन सोने की खरीद के संदर्भ में मुखर्जी ने कहा कि भारत के पास 285 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है और हमने सोना खरीदने के लिए 6.5 अरब डॉलर खर्च किए हैं।

उन्होंने कहा कि 1991 में हमने अपना सोना गिरवी रखा था और अब स्थिति बिल्कुल उलटी है। उन्होंने संकेत दिया कि सोने की खरीद का रुपया के मूल्य पर किसी तरह का प्रभाव नहीं होगा।

जी़-20 बैठक में वित्तीय लेनदेन पर टोबिन टैक्स के ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन के प्रस्ताव के बारे में मुखर्जी ने कहा कि हमें प्रस्ताव का पूर्ण ब्यौरा मिलना बाकी है। इससे पहले, ब्राउन ने जी़-20 बैठक में वित्तीय लेनदेन पर एक कर लगाने की वकालत की थी, जिससे बैंकों को समाज के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया जा सके।

जलवायु परिवर्तन के मुद्दे के संबंध में वित्त मंत्री ने कहा कि विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन घटाने में अधिक योगदान देना होगा, जिसके लिए 2030 तक उन्हें करीब 80 अरब डॉलर की जरूरत पड़ सकती है।

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