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किस्सा किसान क्रेडिट का........

भारत की बहुतायत आबादी गांवों में रहती है। इसकी बहुसंख्यक आबादी किसान है। इन किसानों का कष्ट भी बहुतायत है। यहां तक कि सरकार की सारी योजनाएं,जो लाभ देने की नीयत से बनाई जाती हैं,वह भी अंततः कष्ट देने वाली बन जाती हैं।

हाल के वर्षों में शुरू की गई किसान क्रेडिट कार्ड योजना भी वैसा ही कष्टकारी रूख लेता दिख रहा है। किसानों को फसल की निश्चित उत्पादन तय कराने के लिए तथा निश्चित लाभ दिलाने के लिए सरकार ने किसान क्रेडिट कार्ड(केसीसी) नामक एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की थी। तब से लेकर आज तक यह योजना किसानों के साख सृजन
और लाभ दिलाने में कितना सफल रही, यह बहस का मुद्दा है। लेकिन केसीसी किस तरह किसानों को कष्ट दे रही है,यह बात बिहार के औरंगाबाद जिले में लेखक द्वारा किये गये छान-बीन से काफी कुछ स्पष्ट होती है।

केसीसी मूलतः सभी बैंकों द्वारा अपने क्षेत्राधिकार के किसानों को उनकी कृषि योग्य जमीन के स्वामित्व के आधार पर साख के रूप में मुहैया कराई जाती है। यहां इसके दो पक्ष स्वतः ही जुड़ जाते हैं। एक,स्वामित्व के सर्टिफिकेट प्राप्त करने का पक्ष और दूसरा,बैंकों द्वारा साख प्रदान करने का पक्ष। और इन दोनों पहलुओं की कागजी खानापूर्ति के साथ ही किसानों की शोषण की शुरूआत हो जाती है।

हरेक किसान को लैण्ड पोसेशन सर्टिफिकेट(एलपीसी) अंचल अधिकारी देता है। इस पर पहले पहल हल्के का राजस्व कर्मचारी जमीन का रकबा लिखता है। कुटूम्बा ब्लाक के किसान नरेश पांड़ेय का कहना है कि मालगुजारी रसीद कटवाने और अपना जमीन होने के बावजूद भी राजस्व कर्मचारी एलपीसी पर लिखने के एवज में प्रति एकड़ 3000 रुपये के हिसाब से खुल्लम-खुला डिमांड करता है। यह पूछने पर कि आप शिकायत क्यों नहीं करते हैं ? देवरिया पंचायत के किसान रणजीत यादव कहते हैं कि हमनें कईयों बार इसकी शिकायत अंचल अधिकारी से की,परन्तु कोई कार्रवाई नहीं की गई।

तरीके से तहकीकात करने पर पता चला कि अभी तक बिहार में भूमि स्वामित्व हस्तांतरण का कार्य पूरा नहीं किया गया है। इसी धौंस में राजस्व कर्मचारी वसूली करता है और पब्लिक आपाधापी में अपने खानदानी जमीन को भी नाजायज समझ बैठती है तथा उस पर जायज की मुहर लगवाने के लिए कई बार गदगद मन से तो कई बार मलिन मन से लोग मोटी रकम अदा करते दिखते हैं। एलपीसी लेने के बाद किसान केसीसी के लिए बैंकों के चक्कर लगाते हैं।

औरंगाबाद जिले के बैंकों के मुआयना से पता चला कि हरेक ब्रांच मैनेजर के चैंबर में मैंनेजर के साथ ही "केसीसी बाबू" नाम से मशहूर दलाल बैठते हैं। केसीसी संबंधी पूछताछ करने पर केसीसी बाबू बड़े अधिकार से मैनेजर से पहले ही बोल पड़ते हैं कि हमसे
बात कीजिए। फिर बाबू बाहर आए और केसीसी दिलवाने की एवज में अपना कमीशन प्लान समाझाया। साक्ष्य के तौर पर
बाबू ने डायरी में दर्ज किसानों के नाम और मोबाइल नंबर भी दिखाया। तकरीबन यही कुछ कहानी सभी ब्रांच के केसीसी बाबुओं की है।

मेरी मुलाकात एसबीआई औरंगाबाद शाखा के मशहूर केसीसी बाबू-सुनील सिंह से हुई। उसने मुझे बताया कि मैं अपने धंधे में ईमानदार हूं और महीने में कम से कम सौ केसीसी बनवाता हूं। पैसा मंजूर होने के बाद ही मैनेजर साहब हरेक केसीसी खाते से 35 फीसदी डिडक्ट करते हैं और फिर अपना और मैनेजर साहब का कमीशन बंटता है। मैं कभी भी किसानों के पॉकेट पर भार नहीं पड़ने देता हूं। ठीक ऐसे ही दो अन्य मशहूर केसीसी बाबू-जगन्नाथ पांडे़य और भोला लाल से कुटूम्बा के पीएनबी ब्रांच में हुई। सभी ब्रांचों में कमोबेश यही कुछ स्थिति थी।

इस सुविकसित तंत्र पर चर्चा और शिकायत के लिए हमने जिले के टॉप आफिशियल से समय मांगा,तकरीबन सभी आफिशियल मिलने से बचते दिखे। खैर, बड़ी मशक्कत के बाद एसडीएम,औरंगाबाद ने समय दिया, किन्तु मेरे डेटा-बेस उपलब्ध कराने के बावजूद भी कार्रवाई से बचते दिखे और इसे भ्रष्टाचार का अंग बताकर अफसोस जाहिर करते हुए बात को चलंत करने की सारी कोशिशें कर दी। परन्तु मेरे काफी दबाव के बाद उन्होंने दो प्रखंड़ों के बीडीओं को कार्रवाई की हिदायत दी। हम शुक्रगुजार हुए उनके की, उन्होंने कुछ तो किया। खैर, ना मामा से तो कहीं अच्छा है,कंस मामा।

खैर, पूरी छान-बीन से कई बातें स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आईं। नीतीश सरकार की कमाम कोशिशों के बाद भी कमीशन तंत्र पूर्ण स्थापित सत्य बन चुका है। इतना हाई कमीशन के बाद किसानों से केसीसी रिकवरी की उम्मीद नाइंसाफी होगी। यह भी स्पष्ट होता है कि बैंकों के ज्यादातर लोन डूबते क्यों हैं ! टॉप आफिशियल की मनाही इस बात को साबित करती है कि भ्रष्टाचार अब स्वीकार्य अंग बन चुकी है और उनके लिए अब ऐसी बातें एक्शन के लायक नहीं रहीं हैं या फिर कोई न कोई मजबूरी जरूर है, जो उन्हें एक्शन लेने रोकती हैं।

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