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रविशंकर से मिलकर नरम पड़े देवबंदी

विख्यात आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर के साथ विचार मंथन के बाद रविवार को दारुल उलूम का रुख नरम दिखाई दिया। उलूम के उलेमाओं ने स्पष्ट किया कि फतवा तो केवल सुझाव भर है। यह बाध्यकारी कहां है? किसी व्यक्ति ने सवाल पूछा और उसका जवाब दे दिया गया। विचार मंथन के दौरान श्रीश्री रविशंकर ने भी साफ किया कि वंदेमातरम् कोई पूजा नहीं है। इसके असल मायने मातृभूमि का धन्यवाद ज्ञापित करना है। इससे पूजा पद्यति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

दारुल उलूम ने इस फतवे पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद द्वारा पारित प्रस्ताव से पल्ला झाडते हुए कहा कि उससे उलूम का कोई लेना-देना नहीं है। रविवार को देवबंद में हिन्दू एवं इस्लामिक जगत की हस्तियां एक साथ बैठी तो विवाद का काफी कुछ हल निकलना ही था। अपराह्वन तीन बजे के करीब देवबंद पहुंचे श्री श्री रविशंकर का उलेमाओं ने मेहमानखाने में स्वागत किया। फिर बात चली वंदेमातरम पर।

श्री श्री ने वंदेमातरम् के मायने स्पष्ट किए तो उलूम के मोहतमिम मौलाना मगरूबुर्रहमान, नायब मोहततिम मौलाना अब्दुल खालिक मद्रासी, नायब मोहततिम मौलाना अब्दुल खालिक संभली और वंदेमातरम् पर फतवा लिखने वाले सदर मुफ्ती हबीबुर्रहमान खैराबादी समेत सभी उलेमाओं ने कहा कि फतवा तो किसी व्यक्ति द्वारा पूछे गए सवाल का जवाब है। यह सुझाव होता है, न कि बाध्यकारी।

दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना मरगूबुर्रहमान ने भी कहा कि संस्था की ओर से फतवा किसी व्यक्ति के सवाल पर दिया जाता है, यह बाध्यकारी नहीं होता।एक घंटे तक की वार्ता के बाद श्री श्री ने मीडिया से इसकी तस्दीक भी की। उन्होंने कहा कि वंदेमातरम पर विवाद नहीं होना चाहिए। किसी को भी देश के अमन-चैन में खलल डालने का हक नहीं है।

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