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जागो रे.. यानी वोट देना काफी नहीं

हाल में गिरफ्तार हुए प्रेम प्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना बजरंगी की मनोकामना अखबारों में पढ़ने को मिली। वे कहते हैं, मैं राजनीति में आना चाहता हूँ। उनकी माँ को विश्वास है कि बेटा राजनीति में आकर मंत्री बनेगा। मुन्ना बजरंगी के दोस्त हर पार्टी में हैं। वे जौनपुर या आसपास के किसी भी क्षेत्र से चुनाव जीतकर दिखा सकते हैं। देश के कानून उन्हें अनुमति दें तो उन्हें चुनाव ज़रूर लड़ना चाहिए। पर यह बात हमें सोचने को प्रेरित करती है कि कोई राजनीति में क्यों आना चाहता है।

लोकतांत्रिक संसार में अपने किस्म के निराले शासनाध्यक्ष मधु कोड़ा एक मेम्बर वाली पार्टी के नेता होने के बावजूद मुख्यमंत्री बने थे। उन्होंने लोकतंत्र को क्या दिया? जिम्मेदार क्या सिर्फ कोड़ा की राजनीति है? क्या मुन्ना बजरंगी की मनोकामना में ऐसा पाप है, जो दूसरों ने किया न हो? राजनीति के बारे में काफी लोगों की राय है कि यह काजल की कोठरी है। भले लोगों का इससे दूर रहना ही बेहतर। यह दृष्टिकोण ही सबसे बड़ी समस्या है। 

राजनीति का रिश्ता जीवन के हर पहलू से है। स्वस्थ समाज के लिए सुगठित और सुसंगत राजनीति पहली शर्त है। जैसा समाज होगा, उसकी राजनीति भी वैसी ही होगी। जनता की भागीदारी इसे सार्थक बनाती है। भले लोगों की भागीदारी तो इसकी पहली शर्त है। इससे भागने की नहीं इसमें शामिल होने की ज़रूरत है। मुन्ना बजरंगी शामिल होना चाहें तो उनकी इच्छा, पर हर समझदार व्यक्ति को इसमें शामिल होना चाहिए। राजनीति माने सिर्फ  पार्टीबंदी नहीं। भागीदारी के अपने तरीके हैं। आप जो पढ़ रहे हैं यह भी राजनीति है।

दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र भी जनता की भागीदारी का दावा नहीं कर सकते। हाँ पश्चिम के देशों में हमारे लोकतंत्र से बेहतर भागीदारी है। अमेरिकी राजनीति शास्त्री स्टीफन शैलोम ने जनता की काउंसिलों के ताने-बाने की कल्पना से एक मॉडल बनाया है। जय प्रकाश नारायण जिस व्यवस्था की कल्पना कर रहे थे, उसमें सबसे नीचे के स्तर पर जन समितियाँ प्रभावी होतीं। हमारी पंचायत व्यवस्था का उद्देश्य भी यही है। पर ये जागरूक नागरिकों की व्यवस्थाएं हैं। जागरूकता पहली शर्त है।

यह जागरूकता बेहतर जानकारी से तैयार होती है। अज्ञान और अफवाह से उपजी जागरूकता उच्छृंखलता को जन्म देती है। सैद्धांतिक रूप से सबसे अच्छी भागीदारी एक-एक व्यक्ति की सहमति से ही व्यक्त होनी चाहिए। हमें देखना चाहिए कि कौन जनता को अपनी बात कहने का मौका देता है। और कौन उसे सूचना देता हैं।

संसद से लेकर पंचायतों तक हमारे पास जन प्रतिनिधित्व की एक व्यवस्था है। इसके बाद राजनैतिक दलों, सामाजिक संगठनों और स्वयंसेवी संगठनों की कतार है। फिर रेज़िडेंट वेलफेयर असोसिएशन या मुहल्ला सुधार समिति जैसे संगठन हैं। सत्संग समाज, मुशायरा समिति, महिला समाज वगैरह-वगैरह हैं। फिर मीडिया है, जिसकी कई शक्लें हैं। इन सबसे ऊपर एक बाज़ार व्यवस्था है। कारोबार इसका महत्वपूर्ण पहलू है। परम्परा से हमारे पास हरेक व्यवस्था से बँधे मूल्य हैं। मसलन कारोबार से जुड़े मूल्य भी हैं। 

कारोबार माने अंधी कमाई नहीं है। दुकानदार को ईश्वर का डर है या परम्परागत नैतिकता का। उसे बेईमानी से बचने की हिदायत मिली है। डॉक्टर के मूल्य हैं, इंजीनियर के, प्रशासक, पुलिस के और पत्रकार के भी। ये सब परिभाषित हैं। किसी वजह से मूल्य (वैल्यू) का अर्थ कीमत(प्राइस) हो गया। नीति की जगह अनीति ने ले ली। कुछ पिछले सौ साल में हुआ और कुछ दस बरस में। ऐसा ही नहीं कि सब बर्बाद हो गया। नीति के पक्ष में लड़ने वाले भी हैं। अनीति भी हारी है। पर अमानवीयता किसी न किसी नई शक्ल में उभरी है। जटिलता बढ़ी है। व्यावसायिकता मुखर हुई है। खासकर नए समाजों में कारोबारी गतिविधियाँ बढ़ने से मूल्यबद्ध वैचारिक कर्म पिछडा है।  

पिछले हफ्ते राज्यसभा ने ‘संसद और मीडिया’ विषय पर तीन दिन की एक कार्यशाला आयोजित की। कार्यशाला का विषय चर्चा का एक अलग प्लेटफॉर्म माँगता है। अलबत्ता इसमें राज्यसभा के सभापति और देश के उपराष्ट्रपति एम हामिद अंसारी ने पत्रकारिता के बाबत कुछ बातें कहीं, जो कमोबेश दूसरे कारोबारों पर भी लागू हो सकतीं हैं। उन्होंने कहा कि व्यावसायिक पत्रकार को कई तरह की माँगों को एकसाथ पूरा करना होता है। इन माँगों के टकराव की वजह से पैदा हुए हालात पर हमें सोचना चाहिए। माँगों का यह टकराव क्या है? भारत के हालात वही हैं, जो सवा सौ साल पहले अमेरिका के थे। 

व्यावसायिक हितों के टकराव ने तब भी अनैतिकता की सीमाओं को तोड़ा था। चूंकि यह मामला सीधे जनता से जुड़ा था, इसलिए कारोबारी मंसूबों को जनता का ध्यान भी रखना पड़ा। बाज़ार की खासियत है कि वह कृत्रिम मांग पैदा करता है। उसमें बायर और सैलर का द्वंद चलता है। पर अंतत: खरीदार अर्थात जनता की ही जीत होगी। लेकिन किस जनता की? जनता कई हैं। खासतौर से हमारे समाज में एक नितांत दरिद्र वर्ग है। उसके पास न तो अधिकार चेतना है और न अपनी दशा को सुधार पाने का कौशल। उसके हितों की रक्षा मध्यवर्ग को ही करनी होगी।
 
राजनीति सिर्फ वोट की डिमांड और सप्लाई नहीं है। वह नतीजों तक पहुँचने की  सार्वजनिक व्यवस्था है, जो समय, समाज और सत्ता के गलियारों से होकर गुज़रती है। सूचना और ज्ञान की सच्ची शक्ल क्या होगी? फिलहाल तो सूचना एक कारोबार है। और शिक्षा खरीदने लायक माल। पैसा है तो ले जाओ। दोनों चीजें कारोबार के जिम्मे हैं। कारोबार अपने से आगे नहीं देखता। सूचना किसकी सम्पत्ति है? उसे कोई क्यों खरीदे और कोई उसमें कितना तड़का लगाए, ऐसी बातों पर हमारा ध्यान नहीं है। और न हम यह देख पाते हैं कि इसके निर्मल प्रवाह में कैसे अड़ंगे लगते हैं। पूँजी, तकनीक, राज्य, सत्ता, सम्प्रदाय, धर्म, जातीय समूह या कई बार बहुमत भी सूचना के प्रवाह को रोकता है।

रोग सामने आने पर इलाज भी सामने आएगा। मीडिया का कारोबार करीब चार सौ साल पुराना है। हमारे देश में आज़ादी के पहले उसके माने अभिव्यक्ति की आज़ादी के ज्यादा थे, सूचना की आज़ादी के कम। आज़ादी के बाद पहले दो-तीन दशक यों ही निकल गए। फिर ज़मीनी सवाल उठे तो सेंसरशिप का पहला झटका लगा। फिलहाल मीडिया और राजनीति दोनों के बदलाव का दौर है। जनता का काफी बड़ा हिस्सा सूचना नहीं मनोरंजन चाहता है। यह नशा है। इसे भी टूटना है। इन सारे मामलों पर जो सामूहिक समझ बनेगी, वही राजनीति है। आपके तमाम कष्टों की एक वजह आपका उदासीन होना भी है। मुन्ना बजरंगी की तरह आप को भी राजनीति की राह पकड़नी होगी। बेशक अलग इरादों के साथ। 

pjoshi@hindustantimes.com

लेखक ‘हिन्दुस्तान’ में दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं

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