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उर्दू मीडिया : कहीं यह सियासी सर्कस तो नहीं

‘जमीयत ओलेमा-ए-हिन्द कान्फ्रेंस’, ‘इस्लाम हिन्दुस्तान का मजहब है’, ‘वंदे मातरम् के खिलाफ फतवा पर सियासी तनाजा’, ‘सलमान खुर्शीद ने वंदे मातरम् न पढ़ने की मुखालफत की’, ‘जमीयत ओलमा का इजलास’ वगैरह शीर्षक से छपी खबरों, संपाकदीय, आर्टिकल से इन दिनों उर्दू अखबार भरे पड़े हैं।

जमीयत ओलमा-ए हिन्द के तीसवें सालाना जलसे में रखे गए मुस्लिम मसले तो गौण हो गए। इससे इतर अलग ही बहस छिड़ गई। बात दीगर है, जिसे लेकर बवाल मच रहा है। वह तीन साल पहले ही लंबी बहसों के दौर से गुजर चुका है। इस मामले में कोर्ट भी कह चुकी है, सरस्वती वंदना और वंदे मातरम् किसी को गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। खुद जमीयत को भी इस सवाल का जवाब देना भारी पड़ रहा है कि आखिर गड़े मुर्दे उखाड़ने के पीछे उसकी मंशा क्या थी? वह भी तब, जब उसके मंच पर पहली बार कोई गैर इस्लामी गुरु विराजमान हो।

इस विवाद में बेचारे रामदेव बेवजह उलझ गए। सार्वजनिक माफी नहीं मांगने के सवाल पर पीठाधीश्वर और धर्माचायरें से उन्हें धमकी मिल रही है। दरअसल, दारूल उलूम देवबंद 2006 में ही मुसलमानों के लिए वंदे मातरम् न गाने का फतवा जारी कर चुका है। इस्लामी विद्वानों का तर्क है। इस्लाम अल्लाह के सिवाए किसी और के आगे सजदा करने की इजाजत नहीं देता। यहां तक कि अपनी मां और पैंगंबर मोहम्मद साहब के आगे भी नहीं। जमीयत के इजलास में वंदे मातरम् सहित 25 प्रस्ताव पास किए गए थे।

उर्दू मीडिया का कहना है। चूंकि गैर उर्दू मीडिया को मौलाना की कही हर बात फतवा लगती है। इसलिए सम्मेलन में पास किए गए इस प्रस्ताव को भी फतवा मान लिया गया। उर्दू अखबारों में जमीयत के वार्षिक सम्मेलन को लेकर खासी बहस छिड़ी हुई है। ‘इंकलाब’ ने ‘वंदे मारतम् का बेबुनियाद तनाजा’ में जलसा के आयोजकों से पूछता है-आखिर मुसलमानों को कौन वंदे मातरम् गाने को मजबूर कर रहा है? ऐसा नहीं है तो फिर ऐसा प्रस्ताव क्यों लाया गया? एक अखबार ‘देवबंद इजलास फ्लॉप शो थ्री डी ड्रामा, जितनी मुंह उतनी बातें’ में आलमी रुहानी तहरीक के सदर मौलाना हसनुल हाशमी के हवाले से कहता है। बेशक जलसे में रिकार्ड भीड़ जुटी, पर रही बेनतीजा।

जमीयत ओलमा-ए-हिन्द सालाना जलसे के आयोजन की तैयारी महीनों से कर रहा था। स्थानीय स्तर पर 919 बैठकें और हैदराबाद, अहमदाबाद, सूरत, भूवनेश्वर, आजमगढ़, दिल्ली, बंगलुरू सहित 29 शहरों में जलसा करने के बाद सच्चर कमेटी रिपोर्ट और रंगनाथ मिश्र कमीशन की सिफारिशें लागू करने, मुस्लिम सहित सभी अल्पसंख्यों की हिफाज, उनका अधिककार दिलाने, समलैंगता पर रोक लगाने, केंद्रीय मदरसा बोर्ड का गठन न करने, इराक, ईरान, फलस्तीन, इजराइल में व्याप्त तनाव खत्म करने, वंदे मातरम् न गाने, महिला आराक्षण व महिला बिल की मुखालफत करने पर आधारित एजेंडा तैयार किया था।

मांग-पत्र की शक्ल में इसे सरकार तक पहुंचाने के लिए गृहमंत्री पी. चिदंबरम को आमंत्रित किया गया था। अखबार कहते हैं, इन मांगों पर कुछ कहने की बजाए। उलटे चिदंबरम ही कश्मीर का जिक्र कर मुसलमानों को अल्पसंख्यकों की हिफाजत की नसीहत दे गए। ‘हमारा समाज’, ‘अक्सीरियत फिरके की जिम्मेदारी में’ कहता है, चिदंबरम ने कश्मीर का नाम लेकर इसकी गंभीरता महदूद कर दी। अन्यथा देश के दूसरे हिस्से के बहुसंख्यकों को भी इस जिम्मेदारी का एहसास कराना बेहद जरूरी है। 

उर्दू मीडिया को चिदंबरम काअप्रत्यक्ष रूप से इस्लाम को बाहरी बताना भी अच्छा नहीं लगा। अखबार कहते हैं, इसको लेकर देश में कभी कोई विवाद नहीं उठा है। उनकेऐसा कहने से शिव सेना को पुराना नारा- ‘हिन्दुस्तान में रहना है तो वंदेमातरम कहना होगा’ को उछालने का मौका मिल गया। इसके जवाब में मुसलमान भी पूछ रहे हैं। वंदे मातरम् न गाने वाले देशद्रोही हैं तो सदन में राष्ट्रीय भाषा हिंदी में शपथ लेने से रोकने वाली शिव सेना और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना को क्या कहा जाए?

इसी बहाने कई अखबारों को जमीयत ओलमा-ए-हिन्द के मदनी खानदान में छिड़ी वर्चस्व की जंग को भी कुरेदने का मौका मिल गया। ‘अखबार-ए-मशरिक’ ने अपने संपादकीय में जलसे को लेकर संदेह जाहिर किया है कि ‘कहीं यह सियासी सर्कस तो नहीं।’ ‘बीबीसी’ के ब्लाग पर बुसतुल्लाह खान ने तालिबानी, सिपहे सहाबा और लश्करे झांगवी से अलग सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करने के लिए देवबंद की तारीफ की है। इस इस्लामी अदारे से हर साल चौदह सौ बच्चों आलिम बनकर निकलते हैं।

लेखक ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़े हैं

malik_hashmi64@yahoo.com

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