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आत्मकण के सिद्धांतकार

देकार्त और हाब्स की मौत के बाद दार्शनिक जगत में जो सूनापन आया था उसे लाइबनिट्ज ने भरा। लाइबनिट्ज दर्शन की धारा- आत्मकणवाद के प्रवर्तक थे। वे जर्मनी के लिपजिग शहर में 1646 ईस्वी में पैदा हुए। वे कानून, दर्शन और गणित के गहरे अध्येता थे और उन्होंने दर्शन का मुख्य उद्देश्य ज्ञान के मौलिक सिद्घांतों का आविष्कार करना बताया।

लाइबनिट्ज ने द्रव्य को आत्मकण कहा और बताया कि वे एक नहीं किंतु एक प्रकार के हैं। इन आत्मकणों में कुछ का विकास अत्यंत अल्प है और वे सुप्त से हैं। इसी तरह कुछ का विकास इतना ऊंचा है कि वे पूरी जागृत चेतना से हैं। आत्मकण का चरम विकास ईश्वर का है और उसकी चेतना अत्यंत गंभीर, अत्यंत सक्रिय और अत्यंत पूर्ण है। 

उन्होंने बताया कि इन आत्मकणों के बीच ईश्वर ने ऐसा सामंजस्य उत्पन्न कर दिया है कि प्रत्येक का आत्मबोध उसे बता देता है कि दूसरों की आत्मा में क्या हो रहा है। इनका संबंध कुछ वैसा ही है जैसा किसी निपुण घड़ीसाज की बनाई गई घड़ियों का, जिनमें कोई भी दो एक दूसरे को प्रभावित नहीं करती परंतु सभी एक सा समय दिखाती हैं।     

लाइबनिट्ज ‘प्रवाह के सिद्धांत’ को नहीं मानते थे जिसके अनुसार प्रकृति की सभी चीजों में सम प्रवाह है। उनका कहना था कि पिंड चलते हैं तो विश्राम भी करते हैं अर्थात् जो चीज गतिमान है वह अंतत: नष्ट भी होती है। वे कहते कि संसार में कोई पदार्थ ऐसा नहीं है जो क्रिया नहीं करता।

यहां लाइबनिट्ज अपने से करीब हजार साल पहले के बौद्घ दार्शनिक धर्मकीर्ति से प्रभावित दिखते हैं जिन्होंने कहा था- ‘अर्थ क्रिया में जो समर्थ है वही ठीक सच है’। बुद्धिगत ज्ञान पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि यह तभी संभव है जब हम कुछ सिद्धांतों को स्वंयभू सिद्ध मान लें। उनके जिस विचार की सबसे अधिक आलोचना हुई वह यह कि ‘बुराइयों का अस्तित्व अच्छाइयों के लिये जरुरी है’।

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