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महंगाई और लूट

आगरा में महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन करते लोगों ने मोहल्ले की परचून की कई दुकानें लूट लीं। देखने में छोटी लगने वाली यह खबर किसी बड़े खतरे की आहट है। बड़ा खतरा इसलिए कि ऐसा करने वाले लोग किसी राजनीतिक दल के झंडे के तहत प्रदर्शन नहीं कर रहे थे। न ही वे किसी माओवादी संगठन के सदस्य हैं। वे सब समाज के गरीब और दलित वर्ग के सदस्य हैं और राशन की दुकान से चीनी लेने गए थे। दो दिन में 38 रुपए से 45 रुपए किलो का उछाल देख कर भड़क उठे। उन्होंने जो कुछ किया वह स्वत: स्फूर्त था। लेकिन इस घटना से हमारी राजनीतिक व्यवस्था और प्रशासन को चौकन्ना हो जाना चाहिए।

यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसा हर जगह होने लगेगा। लेकिन हम ऐसी स्थितियां क्यों आने दें कि लोगों को ऐसा करना पड़े। अगर लोग ऐसा करने लगते हैं तो एक लोकतांत्रिक सरकार उन पर उस तरह से बल प्रयोग नहीं कर सकती, जैसा सांप्रदायिक और जातीय दंगों पर करती है। इसीलिए आगरा में भी पुलिस लाचार खड़ी रही। महंगाई और भूख के खिलाफ जनता के गुस्से की कई स्मृतियां हमारे इतिहास में भी हैं और विश्व इतिहास में भी। अफ्रीका के इथियोपिया, सोमालिया और सूडान का उदाहरण अक्सर दिया जाता है। अमेरिकी फोटोग्राफर केविन कार्टर का सूडान में खींचा गया पुलित्जर पुरस्कृत वह चित्र भूख की विभीषिका का सबसे प्रमाणिक दस्तावेज है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के अकाल राहत शिविर से एक किलोमीटर दूर एक बच्चा मर रहा है और गिद्ध उस पर नज़र गड़ाए हुए है।
   

हाल में बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने कोलकाता में भूखा जुलूस पर हुई फायरिंग के पचास साल को याद करते हुए विशाल सभा की थी। लेकिन इन सब से न तो वाममोर्चा ने सबक लिया है, न ही अन्य दलों ने। लिया होता तो तीन साल पहले बंगाल में ही माकपा की रैली में आदिवासियों ने भात मांगते हुए तोड़फोड़ न की होती। आज खाद्य पदार्थो की महंगाई 13 प्रतिशत से ऊपर जा चुकी है। उसे नियंत्रित करने के लिए निर्यात और मौद्रिक नीति में परिवर्तन के सुझावों पर तो काम करना ही चाहिए, लेकिन उससे पहले जमाखोरी के खिलाफ स्थानीय और प्रशासनिक स्तर पर चुस्ती लाने की जरूरत है। सरकार खाद्य सुरक्षा को मौलिक अधिकार बनाने का कानून लाने की तैयारी कर चुकी है। लेकिन अगर खाद्यान्न की उपलब्धता नहीं रही और महंगाई का यही आलम रहा तो वैसे कानूनों को कागज से जमीन पर उतार पाना व्यावहारिक नहीं होगा।

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  • Web Title:महंगाई और लूट