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चाहिए समझदारी और पारखी नजर

चाहिए समझदारी और पारखी नजर

शादियां कब होती हैं?
हर साल दीवाली से ग्यारह दिन बाद देव उठान एकादशी से शादी का सीजन शुरू होकर बीच में कुछ दिनों को छोड़कर गुरु पूर्णिमा या आषाढ़ पूर्णिमा से चार दिन पहले समाप्त होता है। यह कोई 6 महीने के लगभग की अवधि होती है।

सीजन में भी कब शादी नहीं होती?
हर साल 15 दिसम्बर से 13 जनवरी तक यानी मकर संक्रान्ति होने तक लगभग एक महीना और फिर जलाने वाली होली से आठ दिन पहले शादियां बन्द होकर 13-14 अप्रैल यानी बैशाखी आने तक विवाह बन्द रहते हैं। इन अवधियों को आम बोलचाल में मल मास कहते हैं। कृषि प्रधान भारत में अत्यधिक सर्दी और मार्च-अप्रैल में मुख्य फसल कटाई के कारण शादी जैसे बड़े आयोजनों को स्थगित रखने की परम्परा चली आ रही है। इनके अलावा भी जब गुरु या शुक्र अस्त होते हैं, तब उनके अस्त रहने के दौरान भी विवाह आदि मंगल काम नहीं होते हैं, यह ज्योतिषीय कारण से है। आम भाषा में इस स्थिति को तारा डूबना कहते हैं।

शुभ दिन, लग्न का कितना महत्व है?
जिस तरह से जन्म समय के आधार पर हमारी उपलब्धियों में उतार-चढ़ाव रह सकता है, उसी तरह से विवाह मुहूर्त के समय और लग्न से भावी विवाहित जिन्दगी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती है। अत: जब तक अत्यन्त आपातकाल न हो तब तक शुभ समय पर जरूर विचार करना चाहिए।

पूजा का विवाह क्या है?
 दूल्हे की राशि से 2, 5, 7, 9वीं राशि में जब सूर्य रहता है, उन महीनों में सिर्फ उन दूल्हों के लिए कम अनुकूल सूर्य गोचर होने से उसे पूजा की शादी कहा जाता है। पूजा के महीने में भी सूर्य के 13 अंश बीत जाने पर विवाह कर सकते हैं, ऐसा कई राशियों का मत है और यह व्यावहारिक भी है।

यह सूर्य किन-किन राशियों में शुभ होता है?
भावी दूल्हे की राशि से 3, 6, 10, 11वीं राशि में शुभ, पूजा वाली पूर्वाेक्त राशियों में मध्यम शुभ और 4, 8, 12वीं राशियों में अशुभ होता है।

क्या दुल्हन की राशि से भी कुछ देखा जाता है?
हां, दूल्हे की राशि से सूर्य और चन्द्रमा की स्थिति और दुल्हन की राशि से बृहस्पति और चन्द्रमा की स्थिति देखते हैं। चन्द्रमा 4 और 8 वीं राशि में रहने पर विवाह वर्जित है। बृहस्पति साधारणतया पूज्य रहने के कारण खराब राशियों में रहते हुए भी उसका दान और खास पूजा करके विवाह किया जाना उचित है।

कौन सी राशि देखते हैं?
जब जन्म की अंग्रेजी तारीख से, जन्म के नक्षत्र से और बोलते नाम से तीन तरह की राशियां चलन में हैं तो विवाह का दिन तय करने में किसे प्राथमिकता दें, यह बात बड़े महत्व की है। यदि दोनों की नक्षत्र राशि मालूम हो तो, उसे ही प्राथमिकता देते हैं। ज्ञात न हो या किसी एक की ही नक्षत्र राशि पता हो तो बोलते यानी पुकार के नाम से विवाह सुझना चाहिए। किसी भी हालत में एक का नक्षत्र नाम और दूसरे का पुकार नाम लेकर बेमेल खिचड़ी पकाना सख्त मना है।

आपातकाल में क्या करें?
यदि शुभ मुहूर्त का इंतजार करना सम्भव न हो, परदेश जाना, कोई राष्ट्रीय मुसीबत, घरेलू बाधा, बुजुगरें की इच्छा या मजबूरी हो तो केवल तिथि, नक्षत्र और लग्न अनुकूल देखकर समय तय किया जा सकता है।

जब रजिस्टर्ड शादी करें
तब अदालती सुविधानुसार कार्यवाही पूरी करके अपने धार्मिक रीति-रिवाज और आस्था के अनुसार उक्त प्रकार से समय तय करके विवाह की रस्म सम्पन्न करें। यह मुहूर्त निर्धारण धर्मानुसार वैवाहिक रस्म के लिए है और वही असली शादी है। बिन फेरे और सप्तपदी के हिन्दू विवाह कानूनी तौर पर भी पक्का नहीं होता।

इस बार तारा कब डूबेगा?
दिसम्बर 14 से फरवरी 6 ,2010 तक शुक्र अस्त का दोष रहेगा। फिर 15 फरवरी 2010 से गुरु अस्त दोष शुरू हो जाएगा।

बाल विवाह उचित है?
वेदों में बाल विवाह का कतई समर्थन नहीं है। ‘युवानं विन्दते पतिम्’ कहकर वेदों में भरपूर जवान होने पर ही शादी की बात कही गई है। यही बात विवाह के मन्त्रों में अनेक जगहों पर शीशे की तरह साफ हो जाती है। अत: कच्ची उम्र में विवाह की प्रथा जहां कहीं भी है, वह स्थानीय रिवाज या तत्कालीन किसी मजबूरी के कारण ही शुरू हुई होगी।

क्या शादी करना वाकई जरूरी है?
शास्त्रानुसार मनुष्य को सामाजिक रूप से अनुशासित रहने, पारिवारिक टीम भावना से काम करने, रिश्तों-नातों की मर्यादा का पालन करने और सच कहें तो पशुओं की तरह से स्वच्छन्द काम सम्बन्धों से बचाने और अच्छे सभ्य नागरिक पैदा करने के लिए विवाह की व्यवस्था की गई है। ‘सह रेतो दधावहे प्रजां प्रजनयावहे’ यानी तन-मन का सुख और अच्छी सन्तान ये दो मुख्य उद्देश्य विवाह के हैं और रहती दुनिया तक रहेंगे।

शुद्घ विवाह दिन कौन से हैं?

नवम्बर 2009
01, 05,10,12,13,22, 23, 27 और 29 तारीखें शुद्घ हैं।

दिसंबर 2009
02,,09,10,11 और 12 तारीखें ही हैं।

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