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लवस्टोरी जरा हटके

लवस्टोरी जरा हटके

यूपी के सीतापुर गाँव में यही हुआ। 55 साल की एक विधवा ने 20 साल के युवक से शादी कर ली। यह घटना लव-स्टोरी का कथित जमा पहनकर आई। विवाह करने वाली महिला किसी संभ्रांत तबके की नुमांइदगी नहीं करती न ही उसकी मंशा इस शादी के बहाने अपने नीरस जीवन में रोमानियत की बहार लाने की है। न तो इस विवाह को किसी ने सेलिब्रेट किया और न ही इसमें  आधुनिकता और बिंदासियत के सितारे झिलमिलाए। यह विवाह एक ऐसे गाँव के दो लोगों के बीच हुआ, जहाँ पिछड़ेपन की सारी निशानियाँ मौजूद हैं। जहाँ जड़े में शेर का खौफ मंडराता है तो बारिश में बाढ़ खेती और जिंदगी दोनों तबाह कर देती है। प्राथमिक विद्यालय में ताला पड़ा है और महिलाएँ बिना घूँघट किए घर से बाहर नहीं आतीं। बिसवाँ तहसील से कोई बीस किलोमीटर दूर बसे सकरन गाँव में हुई जानकी और दिनेश की शादी का मकसद अपने एकाकीपन को दूर करने की कवायद या अपने प्रेम को क्लाइमेक्स तक पहुँचाने की जुगत भर नहीं है। दरअसल यह उस जिल्लत भरी जिंदगी से बाहर आने की एक कोशिश है जिसे जनकी एक अर्से से ङोल रही थी। जनकी आपबीती सुनाती हैं और वह कारण भी जिनकी वजह से वह दिनेश की तरफ आकर्षित हुईं। जनकी कहती हैं,‘करीब पाँच साल पहले मेरे पति की मौत हो गई और मैं अपने बेटों पर आश्रित हो गई। मेरे बेटों ने मुङो मारना-पीटना और गालियाँ देना शुरू कर दिया।  रोज-रोज की इस दिनचर्या से मैं ऊब गई थी। हालाँकि मैं अपने खर्चे खुद उठाती थी। खेतों में गेहूँ काटती थी। इसके बावजूद वे मुझसे लड़ते थे। इसी खेत में दिनेश भी गेहूँ काटने आने लगा। मैं उसे अपनी आपबीती सुनाती तो वह मुझसे हमदर्दी जताता। यही हमदर्दी लगाव में बदल गई।’ इस लगाव की खबर जब जनकी के बेटों को हुई तो वे उसकी जन के दुश्मन बन गए। उन्हें एक स्त्री और माँ के सम्मान की भी चिंता न रही। जानकी का बेटा हीरालाल बड़ी ऐंठ में स्वीकार करता है,‘हाँ, मैंने जानकी को बुरी तरह से पीटा था। वह भी पूरे गाँव के सामने।’ फिर क्या, उसी मजमे में उत्तेजित दिनेश ने भी आगे बढ़कर जानकी की माँग अपने खून से भर दी। यानी कुछ भी पूर्व-नियोजित नहीं था। जो भी हुआ वह एक लमहे में अपने अंदर भरे आवेग की प्रतिक्रिया थी।

इस शादी को करीब 20-25 दिन बीत गए हैं। आज भी इस शादी की चर्चा पूरे इलाके में हैं। गाँव के पुरुष चौराहे पर और राह चलते इस मुद्दे पर बतियाते हैं। जानना चाहते हैं कि क्या जनकी के बेटे का क्रोध शांत हुआ! उनकी जिज्ञासा स्वत:स्फूर्त तो है मगर मासूम नहीं। जानकी का बेटा हीरालाल कहता है,‘अब हर किसी के पास मेरी माँ से जुड़ी एक कहानी है। पान की दुकान से लेकर शराब की भट्टी तक किस्सों की भरमार है। लोग मुझसे सीधे कुछ न कहें मगर मैं गाँव की बाहरी पगडंडी से गुजरूँ तो उनकी फुसफुसाहट तेज हो जाती है।’ जाहिर है इन चर्चाओं में खुशनुमा अहसासों की  बयार नहीं है। उलटे आक्रोश है। उन्हें नुकसान पहुँचाने की मंशा है। यह मंशा जानकी के बेटे हीरालाल की बातों से साफ झलकती है। वह कहता है,‘अगर वे मेरे सामने आए तो मैं दोनों को मार डालूँगा।’ गुस्सा एक तरफ नहीं है। दिनेश का परिवार भी आक्रोश में हैं। उसका छोटा भाई अशोक तो दोनों के जिक्र पर ही बिफर उठता है। फिर घूरती आँखों के साथ कहता है, ‘जो उन्हें करना था सो कर लिया। हमारा उनका कोई संबंध नहीं है!’ बाकी के गाँव वाले दबे शब्दों में कहते हैं कि ये बच्चे यानी अशोक और उसके दूसरे भाई किसी भी दिन दिनेश की हत्या कर सकते हैं। जिस घर में वह रहता है उसका छप्पर फूँक सकते हैं या फिर किसी नुकीली चीज का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। जने-अनजने वे हत्या के तरीके भी सुझ देते हैं। कोई बाहर से इस घटना पर बात करने आए तो पूरा गाँव उसे घेर लेता है। लोग आवाजें देकर एक दूसरे को बुला लेते हैं। वे सवालों का जवाब देने के बजय उल्टे पूछते हैं कि बाहर के समाज में इस घटना का जिक्र कैसे किया जा रहा है?

गाँव वालों के पास गुस्से के साथ-साथ अपने-अपने विश्लेषण भी हैं जो उन्होंने जनकी के चरित्र के बाबत गढ़े हैं। मसलन ‘वो तो शुरू से ऐसी थी।’‘पहले भी तो भाग के आई थी।’‘ये उसकी तीसरी शादी है।’ जानकी के जेठ साधू छोटेलाल तो यह कहने से भी नहीं चूकते कि उनके भाई के साथ उसका ब्याह ही नहीं हुआ था। ऐसे ही रहती थी। जनकी इस बात का खण्डन करती हैं। वह कहती हैं,‘यह सच है कि छोटेलाल के भाई के साथ मेरा दूसरा ब्याह था। मेरा पहला ब्याह बचपन में हुआ था। बाद में लड़का निकम्मा निकल गया तो माँ-बाप ने गौना नहीं किया। बाद में छोटेलाल के भाई के साथ मेरा ब्याह हुआ। मेरा पहला ब्याह मेरे किसी दोष के कारण नहीं टूटा था।’

हालाँकि गाँव की महिलाएँ थोड़ी अलग-सी राय रखती हैं। वह दबे शब्दों में जानकी के इस साहस की सराहना भी करती हैं। मसलन नुक्कड़ पर पान की दुकान चलाने वाली कलावती। वह खुद अपने बेटों की सताई हैं। वह कहती हैं,‘जो किया ठीक किया। आखिर कोई कब तक मार खाएगा।’ कलावती को उम्मीद भी है कि एक दिन दिनेश का पिता इस रिश्ते को स्वीकार कर लेगा। कलावती जसी इस गाँव में कई स्त्रियाँ हैं जो बेटों या पति की सताई हैं और कहीं न कहीं जानकी जैसी जिंदगी जी रही हैं। वे जनकी के फैसले पर चकित भी हैं। उनके लिए यह एक अजूबी बात है। जनकी व दिनेश के साहस और गाँववालों की आलोचनाओं के इतर सकरन में कुछ जज्बाती सिसकियाँ भी हैं। दिनेश की माँ की सिसकियाँ। जिसकी आँखों से झरते आँसुओं में एक आस भी है कि शायद बेटा जनकी के साथ किसी दिन लौट आए। हालाँकि जनकी और दिनेश कहीं गए नहीं हैं। वे इसी गाँव में हैं। बाहरी हिस्से में बने एक किसान दम्पत्ति के घर में पनाह लेकर रह रहे हैं। कब तक वहाँ रह पाएँगे, यह पता नहीं! क्योंकि न तो गाँव वालों का गुस्सा ठंडा हुआ है न ही दोनों की सुरक्षा के लिए कोई बंदोबस्त है। गाँव के पूर्व ब्लॉक प्रमुख देवी शंकर बाजपेई ने हाल ही में गाँव दौरा किया। वह खुद भी खतरे की बात स्वीकारते हैं। जानकी और दिनेश को अब लोगों के गुस्से की परवाह नहीं है। होती तो वे इस संबंध को स्वीकारते क्यों? दिनेश कहता है,‘जब मेरे परिवार को पता चला था तो मैं इस संबंध को नकार सकता था। क्षमा माँग सकता था मगर मैंने जनकी के साथ रहना पसंद किया।’

कुल मिलाकर सकरन की यह बेमेल शादी महज एक लव स्टोरी भर नहीं है। यह शायद रुढ़िवादियों और कट्टरपंथियों के लिए एक चेतावनी भी है कि तुम बंधनों की जकड़ जितनी बढ़ाओगे, उसका विरोध उतना ही मजबूत होगा। मनोवैज्ञानिक पल्लवी भटनागर कहती हैं,‘जब बंधनों की ओवरडोज हो जती है तो आदमी सिर्फ छटपटाता नहीं है बल्कि बंधनों को तोड़कर खुली हवा में साँस लेने की हिम्मत भी जुटा लेता है।’ कहीं जानकी और दिनेश के साथ भी यही तो नहीं हुआ!

‘हमने जिस तरह से अपने बच्चों और बुजुर्गो को अकेला छोड़ दिया है उसमें बहुत हद तक संभावना है कि समाज में बेमेल प्रेम संबंध या विवाह की घटनाएँ बढ़ जाएँ। दरअसल ऐसे संबंधों में एक तरफ बुजुर्ग होते हैं जो अपने बच्चों के साथ समय रहते अपने ममत्व का इजहार नहीं कर पाए। और दूसरे सिरे पर वो किशोर हैं जिन्हें सही समय, सही मोड़ पर माँ-बाप के अपनेपन की छत्रछाया नहीं मिली।’

जानकी और दिनेश की कहानी भले ही किसी एक तबके की कहानी हो मगर पल्लवी मानती हैं कि जिस समाज में हम जी रहे हैं वहाँ अधिक आयु वाले व्यक्ित का कम आयु वाले व्यक्ित की तरफ आकर्षित होना कोई बड़ी बात नहीं है। उनके पास इसके ठोस कारण भी हैं। वह मानती हैं कि आज के युवा के पास किसी के लिए समय नहीं है। न अपने बच्चों के लिए, न अपने माता-पिता के लिए। ऐसे में बुजुर्गो को जहाँ कोई ऐसा चाहिए होता है जिस पर वह अपना ममत्व लुटा सकें वहीं किशोरों को कोई ऐसा चाहिए होता है जो किसी बड़े की तरह उनकी देखभाल कर सके। यानी आज की दुनिया में बुजुर्ग और किशोर दोनों भावनात्मक रूप से तनहा हैं। इसीलिए वे एक दूसरे से जुड़े रहे हैं। उनके जुड़ाव को प्रेम या आकर्षण जसे शब्दों में परिभाषित भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि दोनों भावनात्मक प्यास बुझने के लिए एक दूसरे के करीब आते हैं। प्रेम तो एक माध्यम बन जाता है!

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