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दूल्हे राजा: दुल्हन का ड्रेस डिजाइनर

दूल्हे राजा: दुल्हन का ड्रेस डिजाइनर

यूथ वाकई बहुत स्मार्ट हो गया है। तभी तो वह अपने करियर ही नहीं बल्कि अपनी शादी को भी पूरी संजीदा से लेते हैं। इन दिनों युवा अपनी शादी में अपनी ही ड्रेस नहीं बल्कि अपनी दुल्हन की ड्रेस को चुनने में पूरी गंभीरता से ले रहे हैं। 

हर लड़की चाहती है कि वह अपनी शादी में सबसे खूबसूरत दिखे। इसलिए वह अपने लिए बेस्ट ड्रेस चाहती है। मगर अब लड़कियां ही नहीं बल्कि लड़के भी अपनी दुलहन की ड्रेस चुनने में पूरी रुचि ले रहे हैं। दरअसल इसकी वजह है कि पिछले कुछ सालों में फैशन ट्रेंड तेजी से बदले हैं और ऐसे में दूल्हा-दुल्हन पर सुंदर दिखने का प्रेशर भी बढ़ा है। अब दूल्हा अपनी ही नहीं, बल्कि दुल्हन की ड्रेस चुनने में उनकी मदद कर रहे हैं। 

रेणूका जो कि इलाहाबाद की रहने वाली हैं। वह कहती हैं, ‘मेरी शादी जनवरी में है और मेरे होने वाले पति ने ही मेरी सेरेमनी और शादी की ड्रेस फाइनल की है। दरअसल वह चाहते हैं कि मैं शादी में इंडो-वेस्टर्न ड्रेस पहनूं, इसलिए उन्होंने मेरे लिए फिशकट लहंगा और बैकलेस ब्लाउज डिजाइन करवाया है। यही नहीं, हम दोनों की ड्रेस का कलर व वर्क बिल्कुल एक जैसा है।’ वाकई मानना पड़ेगा कि अब लड़के अपने करियर और मैरिज में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते हैं, इसलिए वह दुल्हन के आउट फिट्स पर कुछ ज्यादा ही ध्यान दे रहे हैं। 

इंजीनियर अरनव शर्मा की शादी दिसंबर में है। वह कहते हैं, ‘मेरी शादी बनारस में है, लेकिन शादी के बाद हम लोग दिल्ली में रहेंगे, इसलिए मैं उसका सारा वार्डरोब खुद तैयार कर रहा हूं। वह ट्रेडिशनल व वेस्टर्न में क्या पहनेगी। यह सब मैंने ही डिसाइड किया है। यही नहीं, अभी वह दिल्ली आई थी, इसलिए मैंने अपने अपनी पसंद का लहंगा व साड़ी उसे दी हैं, ताकि वह शादी के दिन उन्हें ही पहनें। 

आज से कुछ समय पहले कि बात है कि दुल्हन शादी में अपनी पसंद की ड्रेस को ही प्रिफरेंस देती थी, मगर अब इसमें होने वाले पति की रजामंदी जरूरी हो गई है। शिल्पा की हाल में सगाई हुई है। वह बताती हैं, ‘अभी मेरे मंगेतर ने मुझे एक मॉडल का फोटो भेजा है। वह चाहते हैं कि मैं शादी पर इस तरह की ड्रेस ही पहनूं। मुझे जब उन्होंने फोन पर बताया तो मुझे अच्छा नहीं लगा, लेकिन बाद में जब मैंने वह फोटो देखी तो वाकई वह ड्रेस बेहद सुंदर थी। इसलिए मैंने उसी स्टाइल की ड्रेस बनने को दी है।’ इस बारे में फैशन डिजाइनर अंजलि कपूर कहती हैं कि अब सिर्फ दुल्हन ही अपने लिए ड्रेस सेलेक्ट नहीं करती हैं, बल्कि उसमें उसके मंगेतर की पसंद भी मायने रखती है। यही नहीं, लड़के भी दुल्हन की ड्रेस चुनने में उनकी पूरी मदद करते हैं। वैसे भी, हर लड़का चाहता है कि उसकी जिस लड़की से शादी हो रही है। वह शादी के दिन बेहद खूबसूरत दिखे।

यही नहीं मैरिज काउंसलर सुधा खन्ना बताती हैं कि उनके पास वैसे तो लोग तब आते हैं, जब उनका रिलेशन अच्छा नहीं चल रहा होता है। मगर कई बार यूथ भी आते हैं कि वह अपनी शादी पर कैसे डिफरेंट दिखे। दरअसल आजकल के युवा बहुत ज्यादा सपने की दुनिया में रहते हैं। यही वजह है कि वह चाहते हैं कि शादी के दिन उनकी दुल्हन किसी अप्सरा से कम न दिखे। इसलिए वह उसकी ड्रेस से लेकर ज्वलरी तक खुद डिसाइड करते हैं। अगर फैशन डिजाइनर लीना सिंह की सुने, तो वह बताती हैं कि हर लड़के-लड़की की च्वॉइस अलग होने के कारण वह अपने आउटफिट्स मिलकर चुन रहे हैं, ताकि शादी के दिन वह सबसे खूबसूरत दिखे। वैसे लड़कों का उनकी ड्रेस में इस तरह इंट्रेस्ट लेने की वजह है कि उनके ऊपर सुंदर दिखने का प्रेशर होता है, इसलिए वे अपनी सेरेमनी से लेकर शादी तक में हर चीज परफेक्ट चाहते हैं।

शादी का मंडप बन रहे हैं कॉरपोरेट हाउस
जोड़ियां ऊपर बनती हैं। यहां तो सिर्फ मेल होता है। बरसों से यह मेल पंडित और मौलवी कराते रहे हैं, लेकिन समय की कमी के कारण अब यह जिम्मेदारी जाने-अनजाने में कॉरपोरेट हाउसों ने ले ली है। भागदौड़ में लगे एलिजिबल बैचलर और सुयोग्य वधुएं अपने लिए परफेक्ट मैच ढूंढने के लिए वेबसाइट्स खंगालने की बजाए अपने इर्द-गिर्द ही संभावनाएं तलाश रहे हैं। कॉल सेंटर इसका सवरेत्तम उदाहरण हैं। लड़का-लड़की देखने का समय लंच टाइम और जगह कॉफी रूम।

कुछ बड़ी कंपनियों ने तो अपने कर्मचारियों को शादी के बंधन बांधने के लिए इनहाउस मेट्रिमोनियल सेवा शुरू कर दी है। इनमें एक बड़ा नाम विप्रो है। इस नामी सॉफ्टवेयर कंपनी का अपना एक इनहाउस इंटरनेट है। यूं समझ लीजिए यह यहां की एक खुली किताब है, जिसमें सभी जानकारी दे और ले सकते हैं। मसलन किसी को कमरा किराए पर चाहिए और किसी को कमरा किराए पर देना हो, कार बेचने और खरीदने के अलावा शादी के विज्ञापन भी इस कंप्यूटर किताब पर उपलब्ध होते हैं। कंपनी के कर्मचारी इस पर न सिर्फ अपने लिए बल्कि अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के संबंध में भी सूचना देते हैं। थोड़े ही समय में मेट्रोमोनियल का हिस्सा तो इतना प्रचलित हो गया कि इसके लिए अलग से व्यवस्था करनी पड़ी। जीवनसाथी की तलाश फूंक-फूंक कर कदम रखने वाली बात होती है। इनहाउस खोज का एक बड़ा फायदा यह है कि लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जान समझ लेते हैं। कंपनी में व्यक्ति के समय का एक बड़ा हिस्सा बीतता है। इस दौरान उसका कुल व्यक्ितत्व नजर आ सकता है। ऐसे में गच्च खाने की संभावना भी कम हो जाती है।

इस प्रकार की शादियों का बड़ा फायदा यह है कि मियां-बीवी एक साथ ऑफिस आते-जाते हैं। लंच एक साथ करते हैं और उन्हें एक-दूसरे की दिक्कतों का बखूबी अंदाजा होता है। यह जरूरी नहीं कि दोनों एक ही जगह पर तैनात हों लेकिन एक ही बिल्डिंग में होने से भी साथ रहने का अहसास मौजूद रहता है।


खूब मनुहार कराने के बाद खाता है वर
बारात कन्या पक्ष के यहां पहुंचती है। वर का नाई ऐपनवारी लेकर आता है तथा बारात पहुंचने की सूचना देता है। कन्या पक्ष के सभी लोग आकर बारात का स्वागत करते हैं। द्वारचार के लिए तैयारी की जाती है। दोनों द्वारों पर कहारिनें दो कलशों में अनाज और घी का दीपक लेकर खड़ी होती हैं।  घर की स्त्रियां गाना गाती हुई वर का स्वागत करती हैं। वर द्वार पर पहुंचता है, उसी समय कन्या महिलाओं के पीछे से आकर वर पर अक्षत देती जाती हैं। जयमाला के बाद वर को मण्डप में ले जाते हैं। वर का बड़ा भाई वधू को वस्त्राभूषण देता है। कन्या की मां पहले वर का अंगूठा तथा बेटी के हाथ हल्दी से पीले कर देती हैं। हाथ पीले करने के बाद हथलोई से कन्यादान दिया जाता है। हवन, लाजा होम होता है, विवाह के वचन पढ़े जाते हैं। इसके बाद कोहबर में वर-वधू को ‘बाती मिलाई’ के लिए दई-देवता के पास ले जाते हैं। सुबह को वर जनवासे पहुंच जाता है। इसी दिन बढ़ार का दिन होता है। वर पक्ष को कुंवर कलेवा के लिए बुलाया जाता है। वर को मनुहार करके खिलाया जाता है। विदाई के समय ससुर को ‘बेला’ में चने की दाल और रुपये दिये जाते है। मण्डप हिलाने के रस्म में मण्डप की गूथ खुलवाई जाती है। वर-वधू का तिलक होता है, मिलनी की रस्म होती है। नाईन वधू को पानी पिलाती है तथा वधू पानी में रुपये डाल कर वापस कर देती है। विदाई के बाद गांव या शहर की सरहद पर पहुंच कर वधू के ऊपर से अनाज वार कर वहीं पर गिरा दिया जाता है या दे दिया जाता है। वधू के ससुराल पहुंचने पर शुभ मुहूत्र्त में गृह-प्रवेश तथा दई-देवता का पूजन कराया जाता है। कंगन छोड़ाई की रस्म होती है तथा वधू को मुंह दिखाई दी जाती है। कुछ दिनों बाद मण्डप विसर्जित कर दिए जाते हैं।

परिजन की मृत्यु पर भी नहीं टलता विवाह
मारवाड़ी शादियां अपने आप में एक अनूठा समां बांधती हैं। भारत के पश्चिमी भाग के इस हिस्से को मरूवार या मारवाड़ भी कहा जाता है। इसमें मुख्यत: जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर रियासतें हैं। विवाह तय हो जाने के पश्चात ब्राह्मणों द्वारा सावा (विवाह का मुहूर्त) निकलवाया जाता है। विवाह के पन्द्रह दिन पहले संबंधियों को निमंत्रण-पत्र भेज दिए जाते हैं। लग्न पत्रिका में हल्दी की गांठ, मूंग, चांदी का रुपया इत्यादि रखकर सहमति के रूप में बींदनी का हाथ लगवा कर भेजा जाता है। विवाह पूर्व नान्दी मुख श्राद्ध भी किया जाता है, क्योंकि इसके पश्चात यदि परिवार में किसी की मृत्यु हो जाए तब भी विवाह नहीं टाला जाता।

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