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विकास के संघर्ष से उपजा विनाश का मुकाम

वह शुरू होते जाड़े की एक स्याह शाम थी। मैं झारखंड के मुख्यमंत्री आवास में ‘माननीय’ मुख्यमंत्री के आने का इन्तजार कर रहा था। वे कहीं बाहर से लौटे थे और तरोताजा होने के लिए अंदर गये थे। इंतजार छोटा था पर उसी दौरान एक बड़ा अनुभव हुआ। लकदक सफेद कपड़े पहने कुछ नाटे, कुछ मोटे, कुछ बूढ़े, कुछ गंजे और सभी अंगुलियों में अंगूठियां चढ़ाए हुए एक सज्जन कमरे में घुसे। साथ बैठे साथी ने परिचय कराया- अमुक फलाने विभाग के मंत्री हैं और अभी इनकी बेटी की शादी की चर्चा तो आपने सुनी ही होगी।
वह शादी उस समय जबरदस्त चर्चा में थी। इस तरह की धूमधाम लोगों ने पहले नहीं देखी थी और यह सोच कर विस्मित थे कि मंत्री बने बैठे इस व्यक्ति के पास इतना सारा धन आया कहां से? उनका काम नहीं शाहखर्ची चर्चा में थी। इस पर ज्यादा दिमाग लगाता, उससे पहले ही मधु कोड़ा सामने खड़े थे। एक अत्यंत सामान्य व्यक्तित्व का व्यक्ति विनम्रता का लबादा ओढ़े हुए खुशआमदीद कह रहा था। मैं उनके व्यक्तित्व को देख कर सोच में पड़ गया कि इस व्यक्ति ने कैसे इतना बड़ा सियासी कारनामा कर दिखाया ? यदि भजनलाल देश की राजनीति में ‘आया राम और गया राम’ संस्कृति के जनक माने जाते हैं, तो मधु कोड़ा तो उनसे कई कदम आगे निकल गये थे। निर्दलीय विधायक होने के बावजूद उन्होंने कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी को अपने समर्थन के लिए मजबूर कर दिया था। आमतौर पर निर्दलीय लोग दलीय गठबंधनों को समर्थन करते हैं। साधारण से दिखने वाले इस शख्स की यह असाधारण कारगुजारी थी कि कई दलों का गठबंधन उसके पीछे कतार बना कर खड़ा था। बाद में बातचीत के दौरान मैंने पाया कि श्रीमान कोड़ा के पास कोई बड़ा राजनीतिक विचार नहीं है। बस वे इतना जानते हैं कि सरकार कैसे बनायी जाती है और कैसे चलायी जाती है? पूरे दो साल तक वे सियासत का यह अद्भुत तमाशा सफलतापूर्वक निभाते रहे। उनके किले जैसे सुरक्षित आवास से निकलते समय सोच रहा था कि प्रशिया के महान कूटनीतिक बिस्मार्क के बारे में कहा जाता है कि वह हवा में एक साथ पांच गेंदें उछालता था, लेकिन एक वक्त उसके हाथ में महज एक ही गेंद रहती थी। मधु कोड़ा भी तो यही कर रहे थे। बिस्मार्क ने जो
किया अपने देश के भले के लिए किया। कोड़ा ने क्या किया?

इस सवाल का जवाब सोचते-सोचते मैं मेन रोड पर पहुंच गया था। अचानक मुझे वषों पहले इसी सड़क पर उमड़ता हुआ एक जनसैलाब याद आ गया था, जिसमें हजारों लोग तीर-कमान और मशालें लिए हुए मार्च कर रहे थे। उनकी मांग थी कि उन्हें झारखंड दिया जाये। एक ऐसा अलग प्रदेश, जो उनका अपना हो। जहां वे अपनी मर्जी से अपनी संस्कृति और परंपराओं की रक्षा के साथ-साथ विकास भी कर सकें। महान बिरसा मुंडा ने कभी अंगरेजों के खिलाफ उलगुलान (संपूर्ण क्रांति का आह्वान) किया था। यकीन जानिए उस दिन उन मशालों के पीछे से चमकती आंखों में मुझे बिरसा के सपनों की ज्वाला धधकती दिख रही थी। खुद मधु कोड़ा भी उस इलाके से आते हैं, जहां कभी आदिवासियों ने अपने हक-हुकूक के लिए जम कर खून बहाया था। होटल तक पहुंचते-पहुंचते मैं उलझ गया था। बिरसा का उलगुलान, आम आदिवासी के सपने, झारखंड का निर्माण और उसके पीछे छिपे लाखों लोगों के अरमानों का कब्रिस्तान। कभी-कभी लड़ाइयां कहां से शुरू होकर किस मुकाम पर पहुंच कर उलझ जाती हैं?

आज मधु कोड़ा पर हजारों करोड़ के घपले का आरोप है। जांच एजेंसियों से जुड़े लोग कहते हैं कि खुद कोड़ा भी नहीं जानते कि उनके पास कितनी संपत्ति है। हर क्षण इन एजेंसियों का शिकंजा उन पर कसता जा रहा है। वे इस समय अस्पताल में हैं पर कभी भी सलाखों के पीछे धकेले जा सकते हैं। मैं इस सवाल में नहीं उलझना चाहता कि ये एजेंसियां अपना काम किस तरह कर रही हैं? इसका अंजाम क्या होगा? आज तक किसी बड़े नेता को भ्रष्टाचार के आरोप में सजा नहीं हुई है। लालू यादव भी इसी झारखंड में जेल गये थे। पर जैसे बुरे दिन बीत जाते हैं, वैसे ही उनका निर्वासन भी चुक गया। वे फिर जनता की अदालत में दहाड़ रहे हैं।
  
मधु कोड़ा का क्या होगा इस पर चर्चा करने से बेहतर होगा कि हम झारखंड और इस देश के उन लोगों पर बात करें, जिनकी अनमोल जिंदगियों की कीमत पर ये राजनेता अपनी काली आकांक्षाओं के महल खड़े किया करते हैं। झारखंड के साथ ही उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ बने थे। इनमें से झारखंड और छत्तीसगढ़ की चर्चा तो सिर्फ खून-खराबे और माओवाद के लिए होती है। आज जो लोग बंदूकें उठा कर जंगलों की खाक छान रहे हैं, वे डेढ़ दशक पहले अलग राज्य और खुशहाली के सपने देखा करते थे। लोगों की भोली आकांक्षाओं का गला घोंटने का क्या अंजाम होता है इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं ये दो प्रदेश। इन दोनों प्रदेशों के 42 जिलों में से 32 माओवादी हिंसा से थर्रा रहे हैं। इन जगहों पर न सड़कें बन रही हैं और न बिजली की नयी लाइनें बिछ रही हैं। विकास की तो बात ही मत कीजिए, विनाश अपनी काली चादर फैला रहा है। ऐसे में जब चुनाव होते हैं तो लोगों के मन में गुस्सा फूटता है। रमण सिंह ने तो रायपुर में किसी तरह अपनी कुर्सी बचा कर रखी पर झारखंड राजनेताओं द्वारा पैदा की गयी अराजकता से कंपकंपा रहा है। लोग भ्रष्टाचार से बजबजा रही व्यवस्था के खिलाफ अपनी आकुलता प्रकट कर रहे हैं। पर अच्छे उम्मीदवारों का नितांत अभाव है। राजनीतिक स्थिरता दूसरा मुद्दा है। यहां के नेताओं ने पिछले दस वर्ष में जनादेश का जम कर मखौल उड़ाया है। एक दूसरे को कोस कर सत्ता की चौहदियों में दाखिल होने के बाद दुश्मन दोस्त और दोस्त दुश्मन बन जाते हैं। इसलिए झारखंड के लोग राजनीतिक स्थिरता को दूसरा मुद्दा मान रहे हैं। फिर विकास की दरकार तो सबको है। पर यह होगा कैसे? इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

इतिहास में ऐसे कई अवसर आये हैं, जब सवालों ने ही जवाब गढ़े हैं। उम्मीद है झारखंड भी अपना रास्ता ढूंढ़ लेगा। अस्पताल के बेड पर पड़े मधु कोड़ा भी एक एहसास जगाते हैं। ये वे लोग हैं, जिन्होंने संविधान, व्यवस्था और नैतिकता को पंगु बनाने के लिए जी जान लड़ा दी, पर इस चुनाव में वे दहाड़ नहीं पा रहे हैं। वजह? वे उसी व्यवस्था की चपेट में आ गये हैं जिसे कभी उन्होंने विकलांग बनाने की कोशिश की थी। यह लोकतंत्र ही है, जो भारत में डगमगाता तो है पर गिरता कभी नहीं। खुद से राजनेताओं को मजाक कर लेने देता है पर उन्हें बख्शता कभी नहीं है। मधु कोड़ा और उनकी चौकड़ी इसका नवीनतम उदाहरण हैं।

जिस तरह कभी-कभी प्रश्न अपने उत्तर खुद ढूंढ़ लेते हैं, उसी तरह सत्य भी अपने कायम रहने का मौका अपने आप तलाश लेता है। काश, हमारे जनादेश भी हरबार यह साबित कर पाते।
shashi.shekhar@hindustantimes.com

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