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पराड़कर की परम्परा के पत्रकार

प्रभाष जोशी के निधन की खबर पाकर मैं स्तब्ध हूं। प्रभाष जोशी मेरी राय में सागरमय घोष और बाबूराव विष्णु पराड़कर की उज्जवल परंपरा के कृती संपादक थे। सागरमय घोष ने ‘देश’ के संपादक के रूप में जातीय गौरव चेतना जगाने में जो भूमिका निभाई, वही महत्वपूर्ण भूमिका बीसवीं शती के आरंभ में पराड़कर जी ने निभाई थी।

सखाराम गणेश देउस्कर की तरह पराड़कर ने जातीय अस्मिता की पहचान व उत्थान में ऐतिहासिक भूमिकाएं निभाईं। वे दोनों मराठीभाषी थे पर समस्त भारतीय भाषाओं पर उनका विराट प्रभाव पड़ा। मराठीभाषी सखाराम गणेश देउस्कर ने बांग्ला में ‘देशेर कथा’ लिखकर एक उद्वेलन पैदा किया था तो पराड़कर ने हिन्दी में लिखने और सोचनेवालों को एक नई जातीय दृष्टि दी थी। पराड़कर की उसी गगनचुंबी पत्रकारिता को पिछले चार दशकों में जिन चुनिंदा लोगों ने आगे बढ़ाया, उन्हीं में प्रभाष जोशी थे। जोशी के लेखन में देश की जनता की धड़कन सुनाई पड़ती है।
 
प्रभाष जोशी ने नंदीग्राम के पीड़ितों के साथ खड़े होकर राष्ट्रीय कर्तव्य निभाया था। नंदीग्राम नरसंहार के बाद प्रभाष ने एक जांच दल के साथ वहां का दौरा किया था और नंदीग्राम के दौरे के बाद उन्होंने जो सत्यान्वेषण रिपोर्ट तैयार की थी, उसे हमने अपनी बांग्ला पत्रिका ‘वर्तिका’ में छापा था। उसके बाद ही प्रभाष जोशी के लेखन में मेरी रुचि बढ़ गई थी। उन्हीं दिनों उनकी किताबों का एक सेट मुझे भेंट में मिला। ‘मसि कागद’, ‘हिन्दू होने का धर्म,’ ‘धन्न नर्मदा मैया हो’, ‘जब तोप मुकाबिल हो’, ‘लुटियन के टीले का भूगोल’, ‘खेल सिर्फ खेल नहीं है’ और ‘जीने के बहाने’ किताबों के कुछेक लेख मैंने पढ़े और केवल उन्हीं के आधार पर मैं प्रभाष जोशी को योद्घा कहना पसंद करुंगी। ये किताबें समकालीन राजनीति, साहित्य, संस्कृति, खेल, संगीत, कला व सामाजिक संदर्भों का विलक्षण, सुथरा व गहन संयोजन हैं। मेरी राय में ये कृतियां निबंध विधा को उत्कर्ष प्रदान करने में सक्षम हैं। बहुआयामी पत्रकारीय लेखन भी कैसे स्थाई महत्व का हो सकता है, इसका दृष्टांत भी ये कृतियां हैं।

‘हिन्दू होने का धर्म’ के जो कुछ लेख मैंने पढ़े हैं, उससे पता चलता है कि हिन्दू कट्टरता के खिलाफ प्रभाष जोशी कितने मुखर थे। उन्होंने फासिस्ट ताकतों की जिन शब्दों में आलोचना की, वैसा कोई साहसी संपादक ही कर सकता है। उन्होंने कई प्रदेशों की सांप्रदायिक सरकारों के आचरण पर और सांप्रदायिक नेताओं के भाषणों पर जो सवाल उठाए या फिर समाज में आए क्षरण पर बेबाकी से जो सवाल उठाए, वही एक संपादक का राष्ट्रीय कर्तव्य है। उनके उठाए सवाल वर्तमान के संकट से जुड़ते हैं। जातियों, धर्मों व संप्रदायों में बंटे समाज के संकट पर केंद्रित उनके लेख बौद्घिक जगत को वैचारिक संवाद के लिए आमंत्रित करते हैं तो उसी के समांतर अपने पाठकों को राजनीतिक रूप से चेतन भी करते हैं। इमरजेंसी, छह दिसंबर की शर्मनाक घटना से लेकर नंदीग्राम नरसंहार तक के वैचारिक लेखन से साफ है कि प्रभाष ने समय तथा समाज के हर ज्वलंत मुद्दे को एक जबर्दस्त नैतिक आवेग और गहरे सरोकार से उठाया।

प्रभाष की छोटी गद्य रचनाएं भी बेहद सारवान, पारदर्शी और वैचारिक गर्माहट से भरपूर हैं। ऐसे लेखक-संपादक ही अपने पाठकों के बौद्घिक नायक बनते हैं। प्रभाष अपने भाषी समाज के ऐसे नायक थे जिन्होंने पत्रकारिता के जरिए अपने हिन्दीभाषी समाज की रहनुमाई की और पूरी जागरुकता से की तो जन संघषों में सक्रिय हिस्सेदारी कर एक उज्जवल प्रतिमान की रचना की। जयप्रकाश नारायण के साथ उन्होंने चंबल के डाकुओं के आत्मसमर्पण के काम में जिस तरह सहयोग किया और जन आंदोलनों से जुड़े, वैसा आम तौर पर सामाजिक कार्यकर्ता करते हैं। एक्टिविज्म और पत्रकारिता को प्रभाष के व्यक्तित्व से अलगाया नहीं जा सकता। दिल्ली में रहते हुए भी वे दिल्ली की विकृतियों से दूर रहे। उनके भीतर सदैव मालवा का सच्चा ग्रामीण मानुष रहा। ऐसा मानुष जिसकी सारी प्रतिबद्घता जन के प्रति थी। जन को ही जो सत्य मानता था और जन के स्वाभिमान के लिए देश के कोने-कोने में भ्रमण करता था, सरकारी अनौचित्य को टोकता था। प्रभाष ने पिछले माह मुझे मुंबई के एक विमर्श में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया था किंतु तबीयत ठीक न होने के कारण मैंने मना कर दिया था। मुबंई का वह विमर्श वैकल्पिक राजनीति की रुपरेखा बनाने के लिए हुआ था।

प्रभाष देश में यदि वैकल्पिक राजनीति की संभावना देखते थे, तो इसलिए कि आज की राजनीति भ्रष्टाचार के दलदल में है और उससे कोई उम्मीद शायद ही कोई विचारवान व्यक्ति करता है। वैकल्पिक राजनीति पर विमर्श की रुपरेखा बनाकर प्रभाष ने यह भी दिखाया था कि एक संपादक के सरोकार कितने विराट होने चाहिए।

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