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भविष्य के अखबार

बुरे दिनों की भविष्यवाणी करने से मुझे नफरत है। लेकिन आधुनिक युग में यह नितांत गैरजरूरी हो गया है कि विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए पेड़ काटे जाएं। अब हम विचारों का प्रसार बिना कागज के भी बहुत अच्छी तरह से कर सकते हैं। हम बदलाव के एक कठिन दौर में हैं और इस समय हम यह बिलकुल भी नहीं जानते कि अखबार जब कागज पर नहीं छपेंगे तो लेखकों, संपादकों, शोधकर्ताओं और संपादकों की रोजी-रोटी कैसे चलेगी। लेकिन मेरे हिसाब से यह समस्या बदलाव के दौर की एक समस्या है, मुमकिन है कि आज से 25 साल बाद, जब हम इस बदलाव से पूरी तरह गुजर जाएं तो यह दुनिया एक ज्यादा बेहतर जगह बन जाए।

आज जो अखबार है वह 1836 के आस-पास शुरू हुआ था। अखबार हालांकि उससे पहले ही शुरू हो गए थे, लेकिन तब वे काफी मंहगे थे। 1836 में किसी ने एक नया ‘आविष्कार’ यह किया कि भाप की शक्ति से चलने वाली प्रिंटिंग प्रेस बना डाली। मुझे ठीक से पता नहीं है कि स्टीम इंजन और प्रिंटिंग प्रेस को एक साथ जोड़ देने की
तकनीक को आविष्कार माना जाएगा या नहीं। इससे अखबार सस्ते हो गए। अब यह मुमकिन हो गया कि एक छोटा सा इंजन और छोटी से प्रेस लगाकर कोई भी अखबार निकाल सकता था। 1945 तक तकरीबन हर महत्वपूर्ण शहर में दजर्नों अखबार निकलने लगे। वे सब आधुनिक अखबार तो नहीं थे लेकिन वैसे ही थे जैसे आजकल के ब्लॉग होते हैं।

इन अखबारों में पहली चीज यह हुई कि अपराध की खबरें छापी जाने लगीं। यानी अपराधों का इस्तेमाल कमाई के लिए होने लग गया। अगले सौ साल में अखबार बड़े, और बड़े होते गए। वे ज्यादा संगठित हो गए, और उन्हें प्रकाशित करना भी ज्यादा महंगा हो गया। कभी एक ही आदमी पूरा अखबार निकाल लेता था, लेकिन फिर सहायक रखे जाने लगे। इसके बाद बिजनेस मैनेजरों की जरूरत भी आन पड़ी। विज्ञापन के एजेंट रखे गए और फिर विज्ञापन का पूरा विभाग ही बन गया। खेल के लिए अलग से पेज बने और कार्टून जैसी चीजें भी अखबार में शामिल होने लगीं। 1890 में वायर एजेंसियों का अविष्कार हुआ और इसके बाद सिंडीकेटेड कॉलम व सिंडीकेटेड फीचर जैसी चीजें शामिल हुईं। अगले सौ साल तक अखबार एक दूसरे से आगे बढ़ने के लिए कड़ी व्यापारिक स्पर्धा करते रहे।
   
हम सब इस परिदृश्य में तब दाखिल हुए, जब हर शहर में एक या दो बड़े अखबार थे। इनमें सैकड़ों खबरें और लेख होते हैं। ये चीजें अखबारों में तब भी थीं, जब हम दस साल के थे और पढ़ना सीख रहे थे। तब भी बनी रहीं, जब हम 25 साल के थे और इस व्यवसाय में आ गए थे। जब हम 35 साल के हुए, तब भी वे ऐसे ही बनी रहीं। इससे हम यह मान बैठे कि यही दुनिया का कुदरती और स्थाई दस्तूर है। लेकिन असल में ऐसा नहीं है। यह तो इस पूरे दौर का एक पल है बस। आज जो अखबार हमारे सामने है 1935 का अखबार उससे बहुत अलग था। 1935 में जो अखबार था 1910 का अखबार उससे बहुत अलग था। और इसी तरह से 1910 का जो अखबार था, 1885 का अखबार उससे बहुत ही अलग था। निश्चित रूप से 1836 में जो सिलसिला शुरू हुआ था, आज का अखबार उसी का एक नतीजा है। पर अब यह बहुत बड़ा हो गया है और बहुत महंगा भी। इतना कि यह डानासोर बन गया है। अब उसके लिए छोटे और हल्के-फुल्के सूचना देने वालों से स्पर्धा करना मुश्किल होता जा रहा है।
   
हम फिर से 1836 वाली स्थिति में पहुंच गए हैं। उस स्थिति में जब जो चाहता था, अपना अखबार शुरू कर लेता था। हम यह नहीं जानते थे कि इनमें से कौन अच्छा है, कौन बुरा। कौन भरोसेमंद है और कौन नहीं। यही सब आज भी होता दिखाई दे रहा है। मुझे लगता है कि आज जो ब्लॉग हैं, वे बड़े होते जाएंगे। जो अच्छे होंगे और चल निकलेंगे उन्हें एक सहायक की जरूरत पड़ेगी, फिर दूसरे और फिर तीसरे सहायक की भी। फिर हम एक सदी या उससे भी ज्यादा समय एक नए बाजार को बनाने में लगा देंगे। इसमें कोई बुरी बात नहीं है, यह तो एक अच्छी चीज है।

लेखक अमेरिका के प्रसिद्ध खेल पत्रकार हैं

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  • Web Title:भविष्य के अखबार