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हिंसा से उबारेगा रामकृष्ण परमहंस का जीवन संदेश

भारतीय ज्ञानपीठ ट्रस्ट की तरफ से मूर्ति देवी पुरस्कार के लिए चुने गए कृष्ण बिहारी मिश्र शिक्षक, समीक्षक और रचनाकार हैं। पुरस्कृत रचना ‘कल्पतरु की उत्सव लीला’ रामकृष्ण परमहंस की असाधारण जीवनी है। उसे पढ़ कर लगता है जैसे ठाकुर जी का जीवन आप के सामने घटित हो रहा है। मिश्र जी ने हिंदी पत्रकारिता का इतिहास भी लिखा है, जो उनकी पीएचडी की थीसिस रही है। अस्सी को स्पर्श कर रहे मिश्र की जी लेखनी आज भी गतिशील है। पुरस्कार की घोषणा के बाद उनसे रू-ब-रू हुए एसोशिएट एडिटर अरुण कुमार त्रिपाठी:

कहा जाता है कि आप की ‘कल्पतरु की उत्सवलीला’ श्री मो की बंगला कृति रामकृष्ण वचनामृत से भी ज्यादा रोचक और महत्वपूर्ण है?
ऐसा कहना ठीक नहीं है। रामकृष्ण परमहंस के जीवन पर जो कुछ लिखा गया है उसका आधार तो श्री मो यानी महेंद्र नाथ गुप्त की रामकृष्ण वचनामृत ही है। श्री मो ठाकुर जी के साथ रहे थे। पर वे उस किताब को प्रकाशित नहीं करवाना चाहते थे। बाद में लोगों के कहने पर वे तैयार हुए। इसलिए वह महान रचना है लेकिन मैंने इसे लिखने के दौरान और भी किताबें पढ़ी हैं। लिखते समय इस बात का ख्याल रखा है कि पूरी कथा रामकृष्ण परमहंस के मुंह से कहलवाई जाए। उनकी भाषा ग्राम्य बांग्ला थी। इसीलिए लगता है कि स्वयं ठाकुर जी ही बोल रहे हैं।
लिखते समय आप ने रामकृष्ण के जटिल जीवन में परकाया प्रवेश कैसे किया? यह प्रेरणा आप को किसने दी?
रामकृष्ण के प्रति मेरा आकर्षण शुरू से रहा है। हालांकि इस पुस्तक के कुछ समीक्षक जैसे कि राधाबल्लभ त्रिपाठी इसे परकाया प्रवेश ही कहते हैं। लेकिन मैं इसे परचित्त प्रवेश मानता हूं। मैंने उनकी प्रवृत्ति पकड़ी है। इस रचना के मूल प्रेरक विद्यानिवास मिश्र थे। जब वे मेरी हिंदी पत्रकारिता के इतिहास वाली किताब का विमोचन करने कोलकाता आए तो मैं उन्हें दक्खिनेश्वर ले गया। वहां उन्होंने मुझसे इस किताब को लिखने का संकल्प करवाया। उन्होंने छह सौ पेज की किताब तीन बार पढ़ी। वास्तव में यह काम मेरी आस्था का प्रश्न है।
आज पश्चिम बंगाल में जिस प्रकार माओवाद और हिंसक राजनीति का उभार हुआ है उसमें रामकृष्ण के विचार किस तरह प्रासंगिक हैं?
बंगाल ही नहीं पूरे भूमंडल में अशांति है। इसे दूर करने में रामकृष्ण परमहंस के उपनिषद और वेदांत संबंधी विचार सहायक हो सकते हैं। यह बात यूरोपीय विचारक टालस्टाय, रोम्यां रोलां और टायन्बी सभी ने महसूस किया था। रोम्यां रोलां ने भारत पर जो तीन किताबें लिखी हैं उनमें रामकृष्ण परमहंस की जीवनी बेजोड़ है। आज बंगाल और बाकी दुनिया की दुर्दशा अध्यात्मिक भाव के क्षरण होने और उपभोक्तावाद के पाशविक भाव आने के कारण हो रही है। भारत में समाजवादी आंदोलन के ज्यादातर बड़े नेताओं का मूल विषय इंडोलाजी था। आचार्य नरेंद्रदेव, संपूर्णानंद, अच्युतपटवर्धन, राजनंदन जी वगैरह सब क्रांतिकारी होते हुए भी अध्यात्म के प्रति आकर्षण रखते थे।
आप ने ‘हिंदी पत्रकारिता का इतिहास’ भी लिखा और ‘कल्पतरु की उत्सवलीला’ जैसी साहित्यिक रचना भी। आज पत्रकारिता की मुख्यधारा से साहित्य गायब ही हो गया है। इसकी वापसी कैसे संभव है?
जब व्यावसायिकता की पकड़ में पत्रकारिता आ गई है तो उसमें साहित्य कैसे रह सकता है। आज वह एक ऐसा प्रोफेशन है उसमें मूल्य नहीं हैं। अगर प्रोफेशन के प्रति भी वह सचेत रहे तो अच्छा है, लेकिन वह भी नहीं है। मूल्यों वाली पत्रकारिता के ही कारण उसमें साहित्य था। इस कमी पर अच्युतानंद मिश्र ने काफी लिखा है। रचनात्मक लोग पत्रकारिता से जुड़ेंगे तो यह कमी दूर होगी।
बंगाल ने हिंदी पत्रकारिता और साहित्य में काफी योगदान दिया है। यह सिलसिला रुक गया है या जारी है?
बंगाल आज भी हिंदी के लिए अपना योगदान दे रहा है। दरअसल दिल्ली में बैठे लोग अपने को नियामक मान बैठे हैं। मैं इस धारणा को गलत मानता हूं। दिल्ली और भोपाल हिंदी के नए क्षेत्र जरूर बने हैं और यहां ज्यादातर लोग जा कर जमे भी हैं। पर काशी, इलाहाबाद और कोलकाता जैसे केंद्र आज भी सक्रिय हैं। इन जगहों के लोग भी साहित्य अकादमी पुरस्कार पा रहे हैं। भले आज वहां रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेद्वी नहीं हैं लेकिन वहां के लोग जो काम कर रहे हैं उससे मैं निराश नहीं हूं।
आजकल क्या काम कर रहे हैं?
माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के साथ हुए अनुबंध के मुताबिक मैंने हाल में बालमुकुंद गुप्त पर एक मोनोग्राफ का काम खत्म किया है। उसके बाद रामकृष्ण देव पर भी एक काम कर रहा हूं। उसका विषय यह है कि 19 वीं सदी के रेनेसां में उनकी भूमिका।

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