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मुक्कों की मलिका का खिताबी तेवर

कविता गोयत की विजय गाथा टूटने, बिखरने और फिर मजबूती से खड़े होने की गाथा है। कई बार ऐसे मौके आये कि उसका आत्मविश्वास डगमगा गया। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। अंतत: बीते दिनों पहली बार उसने वियतनाम में हुई इंडोर एशियाई खेलों की मुक्केबाजी स्पर्धा में सोना हासिल कर ही लिया। कविता होनहार है लेकिन इस प्रतियोगिता में उससे गोल्ड मेडल हासिल करने की उम्मीद किसी को न थी। वजह साफ थी कि भारतीय दल में चार बार की विश्व चैंपियन मैरीकॉम, एल. सरिता देवी और एन. ऊषा जैसी स्टॉर मुक्केबाज शामिल थे। निगाहें इन्हीं पर थीं। पर कविता ने करिश्मा कर दिखाया। रिंग में जब मुक्केबाजी को सांसों में जीने वाले देश कजाखस्तान की खासेनोवा सैदा सामने थीं, तो कविता के जेहन में एक ही बात आई कि तू कर सकती है। जीत सकती है। उसने हमलावार रणनीति अपनाई और सैदा को 8-4 से शिकस्त दे कर अपना पहला अंतरराष्ट्रीय गोल्ड मेडल जीत लिया। हरियाणा के हिसार और हांसी के बीच बसे एक छोटे से गांव सिसार खरबला में 15 अगस्त 1988 में जन्मी कविता एक साधारण परिवार की हैं। पिता ओमप्रकाश कबड्डी के अच्छे खिलाड़ी रहे हैं। उनके मन में हमेशा रहा कि उनके बच्चों खेल की दुनिया में अपना हाथ अजमाये। बेटे पवन को उन्होंने हिसार के साई सेंटर में बाक्सिंग के लिये भेजना शुरू किया। गाहे-बगाहे कविता भी उसके साथ जाती। इसी आवाजाही में कविता की दिलचस्पी मुक्केबाजी में हो गई। उसके पहले कोच राज सिंह जब पहली बार 15 साल की कविता से रू-ब-रू हुये तो उन्हें उसके अंदर एक किलिंग स्पिरिट दिखी। मुक्केबाजी के लिये इस तरह की स्पिरिट सबसे ज्यादा जरूरी होती है। वह उनसे मुक्केबाजी के गुर सीखने लगी। खेल के दौरान 2004 के आसपास उसके घुटनों में दर्द रहने लगा। यह ऐसा मौका था जब कविता पूरी तरह से टूट गई। उसेलगा वह मुक्केबाजी अब ज्यादा समय तक नहीं कर पायेगी। लेकिन दिल्ली से हिसार कोचिंग के लिये पहुंचे उसके मौजूदा कोच अनूप कुमार ने कविता की परेशानी को समझा। कविता में उन्हें संभावनाएं दिख रही थीं। सरकारी मदद से उन्होंने उसके घुटनों का इलाज कराया और वह एक बार फिर चुस्त-दुरुस्त हो कर रिंग में फुदकने लगी। ऐसा ही एक बार उसके साथ तब हुआ जब उसे लगा कि उसे मुक्केबाजी छोड़ देनी चाहिये। मौका था नेशनल चैंपियनशिप का। जमशेदपुर में फाइनल में वह खूब लड़ी। लेकिन स्कोरिंग की हेराफेरी में उसे हारा हुआ घोषित कर दिया गया। तब भी वह बिखर गई थी। कोच अनूप कुमार ने एक बार फिर उसे समझाया और उसके अंदर आत्मविश्वास भरा। इसके बाद वह नेशनल चैंपियन भी बनी। कविता ने जाट कॉलेज हिसार से ग्रेजुएशन किया है और आगे एमए अंग्रेजी में करना चाहती हैं। लेकिन कैंप में रहने और यात्राओं के कारण उसे पढ़ाई के लिये समय नहीं मिल पा रहा है। अब उसकी योजना है कि वह प्राइवेट पढ़ाई करे। वह ट्रेनिंग के लिये कनाडा और चीन भी जा चुकी है। कोच अनूप कुमार के अनुसार कविता के अंदर किलिंग स्प्रिट के साथ रिंग क्राफ्ट का अद्भुत संगम है। वह रिंग में विरोधी के हिसाब से तुरत-फुरत रणनीति बनाने में माहिर है। उसके पंच में दम है। कविता का सपना है कि 2012 में होने वाले ओलम्पिक में वह देश का नाम रोशन करे। इसके लिये वह अभी से तैयारियों में जुटी है। इसी चक्कर में वह अपनी पंसदीदा कॉमेडी फिल्में भी अब नहीं देखती है।

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