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गंगा संरक्षण पर यूपी के रवैये से ‘वॉटरमैन’ खफा

अमृत तुल्य माना जाने वाला गंगाजल अब आचमन योग्य नहीं रहा। इसकी प्रदूषण नाशक शक्ति खत्म हो चुकी है। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में गंगा नदी संरक्षण प्राधिकरण के गठन की दिशा में कोई काम नहीं हो रहा, जबकि केन्द्र सरकार ने 30 सितम्बर-2009 को ही इस प्राधिकरण का गठन करने का आदेश जारी कर चुकी है। ये शिकायत मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेन्द्र सिंह की है। वह शनिवार को एनबीआरआई में ‘जल ही जीवन है, इसे बचाओ’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने आए थे।

श्री सिंह ने कहा कि जल संरक्षण पर यूपी की उदासीनता काफी अखरती है। मैंने यूपी के कई अधिकारियों से फोन पर संपर्क कर उप्र गंगा नदी संरक्षण प्राधिकरण के बारे में जानकारी चाही तो वह कुछ नहीं बता पाए। भला ऐसे जल संरक्षण किस तरह होगा, जबकि गंगा व यमुना नदी का सबसे बड़ा हिस्सा इसी राज्य से होकर गुजरता है। उन्होंने कहा कि यूपी में पर्याप्त जल है, लेकिन संरक्षण व प्रबंधन ढंग से न होने के कारण बुंदेलखण्ड में सूखा पड़ता है और पूर्वी क्षेत्र में बाढ़ आती है।

राज्य सरकार को चाहिए कि वह इस प्राधिकरण की जल्द बैठक करे। इसमें पाँच गैर सरकारी लोगों को शामिल करे। इसमें वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता, नदी पर्यावरण विशेषज्ञ, प्रदूषण के जानकार व मीडियाकर्मी शामिल हों। उन्होंने कहा कि गोमती भी अतिक्रमण की मार झेल रही है। इसे राज्य गंगा नदी संरक्षण के तहत संरक्षित किया जाए। वहीं सई व केन नदी भूदोहन के कारण सूख रही हैं।

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