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अर्जेटीना में छाया चीड़ का पिरुल

उत्तराखंड के चीड़ का पिरुल अर्जेटीना में भी छाया रहा। रासायनिक पदार्थ, एलपीजी, ईंधन, भूमि कटाव व जल संरक्षण में यह काफी मददगार साबित हो सकता है। उत्तराखंड में इसके विभिन्न उपयोग के लिए कसरत शुरू हो गई है। अजेंटीना में आयोजित विश्व वानिकी अधिवेशन में प्रदेश के प्रमुख वन संरक्षक डा. आरबीएस रावत ने चीड़ के पिरुल पर प्रजेंटेंसन दिया।

122 देशों के लगभग सात हजार प्रतिनिधियों ने इसमें हिस्सा लिया। उत्तराखंड के कुल वन क्षेत्र के 35 प्रतिशत भूभाग में चीड़ बाहुल्य है। खास बात यह है कि जहां चीड़ होता है, वहां अन्य प्रजाति के कोई पौधे नहीं उग पाते हैं। साथ ही इससे जल स्नोतों के लगातार सूखने का खतरा भी मंडरा रहा है।

राज्य में प्रतिवर्ष दस लाख टन पिरुल पैदा होता है, लेकिन अभी तक यह सब बर्बाद हो रहा है। इससे जंगलों में अग्निकांड की घटनाओं में इजाफा हो रहा है। लेकिन अब वन महकमा इसे कई तरह के उपयोग में लाने की कसरत शुरू कर रहा है। इसमें ग्रामीणों की भागीदारी भी रहेगी।

अर्जेंटीना में हुए अधिवेशन से लौटने के बाद डा. रावत ने बताया कि पिरुल का उपयोग ईंधन, एलपीजी, (लिगनिन) रासायनिक पदार्थ व भूमि के कटाव व जल संरक्षण में सहायक है। विभाग ने यह प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा है। प्रस्ताव को हरी झंडी मिलते ही वैज्ञानिक दृष्टि से इसे उपयोग में लाना शुरू कर दिया जाएगा।

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