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608 करोड़ के ‘गंगा ट्रीटमेंट प्लांट’ पर ग्रहण

जिले के आर्सेनिक प्रभावित गांवों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 608 करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित ‘गंगा ट्रीटमेंट प्लांट’ पर ग्रहण लगता दिख रहा है। केन्द्र सरकार ने गंगा नदी में पानी कम होने की बात कहते हुए इस ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ को खारिज कर दिया है। जिले के आर्सेनिक प्रभावित गांवों में शुद्ध पानी के लिए अब ओवरहेड टैंक बनाये जाएंगे। सरकार ने फिलहाल करीब 25 ओवरहेड टैंकों की स्वीकृति भी दे दी है। इनका प्रस्ताव व प्राक्कलन जल निगम तैयार कर रहा है।

गौरतलब है कि, जिले के कुल 17 ब्लाकों में बैरिया, मुरलीछपरा, दुबहड़, बेलहरी, रेवती ब्लाक क्षेत्रों में पानी में आर्सेनिक होने की पुष्टि देश की विभिन्न सरकारी व गैर सरकारी संस्थाएं परीक्षण के बाद कर चुकी हैं। स्विटजरलैड व जापान से आयी निजी संस्थाओं ने भी बलिया के पानी में आर्सेनिक की पुष्टि की। कई संस्थाओं ने तो हैंडपम्पों से निकलने वाले पानी को भी ‘नो सेफ’ बताते हुए उसके सेवन पर रोक लगा दी, लेकिन पेयजल की वैकल्पिक व्यवस्था न होने के कारण लोग आज भी उसी ‘जहर’ का सेवन करने को मजबूर हैं।

दजर्नों लोग तो आर्सेनिकजनित बीमारियों के शिकार भी हो चुके हैं, जबकि सैकड़ों की संख्या में लोग तिल-तिल कर मरने को विवश हैं। 11 अक्टूबर 05 को बैरिया व बेलहरी ब्लाक के लोगों ने शुद्ध पेयजल के लिए जन आंदोलन की शुरुआत चक्काजाम से की। भारी दबाव पर सरकार ने वर्ष 06 में एडीपी योजनांतर्गत गंगापुर, केहरपुर व राजपुर एकौना गांवों में ओवरहेड टैंक स्वीकृत किये, लेकिन आज तक ये ओवरहेड टैंक लोगों को समुचित ढंग से शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं करा सके।

इसी बीच सांसद नीरज शेखर व लोजपा के जिलाध्यक्ष विनोद सिंह ने केन्द्र सरकार के तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री डॉ. रघुबंश प्रसाद सिंह तथा सचिव पेयजल (भारत सरकार) सुश्री शांति शीला नायर से मिलकर मांग की कि, बलिया का अधिकांश भाग आर्सेनिक की समस्या से जूझ रहा है। लिहाजा कोई ऐसी योजना बने, जिससे लोगों को शुद्ध जल नसीब हो सके। केन्द्र सरकार ने इसे गंभीर विषय मानते हुए मई 09 में जिले में अपनी टीम भेजी और गंगा तथा घाघरा नदी का सर्वेक्षण कराया। टीम के स्थलीय निरीक्षण के बाद केन्द्र सरकार ने बलिया में ‘गंगा ट्रीटमेंट प्लांट’ स्वीकृत करते हुए प्रदेश सरकार से प्रस्ताव व प्राक्कलन की मांग की।

उत्तर प्रदेश जल निगम ने करीब 608 करोड़ का प्रस्ताव व प्राक्कलन तैयार कर भारत सरकार को भेज भी दिया। इसका करीब 10 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकार को भी खर्च करना था। इसमें 310 गांवों को आर्सेनिक प्रभावित बताया गया और करीब 610 गांवों व पुरवों में सरफेस वाटर पहुंचाने की बात कही गयी। इस प्रक्रिया के बाद आर्सेनिक प्रभावित गांवों को भरोसा हो चला था कि, देर से ही सही, उन्हें राहत मिलेगी।

सूत्रों की मानें, तो केन्द्रीय टीम द्वारा चयनित स्थान गंगा नदी के पचरुखिया घाट पर मार्च 2010 से ही इस परियोजना पर काम भी शुरू होने वाला था। इसी बीच, केन्द्र सरकार ने उक्त प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। बताया जा रहा है कि, केन्द्र ने गंगा नदी में पानी कम होने की बात कही है।

हालांकि सूत्रों की मानें तो सरकार ने इतनी भारी रकम खर्च करने से फिलहाल अपना हाथ खींच लिया है। जल निगम के अधिशासी अभियंता आर.एस. शुक्ल के मुताबिक, फिलहाल ओवरहेड टैंक से ही शुद्ध पेयजल की व्यवस्था करने को कहा गया है।

बताया जाता है कि, उत्तर प्रदेश जल निगम ने दो साल पहले ही 25 ओवरहेड टैंक का प्रस्ताव व प्राक्कलन सरकार को भेजा था। फिलहाल सरकार उसी को अमलीजामा पहनाने के मूड में है। उक्त टैंकों के प्रस्ताव व प्राक्कलन को पुन: तैयार करने में जल निगम जुट भी गया है।

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