DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

पत्रकारिता की कसौटी थे प्रभाष जोशी

जिन लोगों ने प्रभाष जोशी से पत्रकारिता सीखी, प्रभाष जी उनके लिए हमेशा पत्रकारिता के एक संदर्भ बिंदु रहे। जनसत्ता के शुरुआती दिनों में वहां काम करने वाले ज्यादातर लोग एकदम नौजवान थे, उन पर प्रभाष जी की गहरी छाप पड़ी, ऐसी कि आज तक ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जिस दिन अखबारी काम के सिलसिले में प्रभाष जी की याद न आई हो। कुछ लिखते हुए, या दूसरे काम करते हुए यह कहीं दिमाग में रहता था कि इस पर प्रभाष जी की क्या प्रतिक्रिया होगी। ऐसा नहीं कि हम सब कुछ वही करते थे, जो प्रभाष जी को अच्छा लगता, उनसे कई मुद्दों पर असहमति भी होती। लेकिन उनसे एक संवाद या बहस लगातार अंदर चलती रहती है। निर्मल वर्मा ने फणिश्वरनाथ रेणु पर लिखते हुए कुछ ऐसी बात कही है कि लेखक एक व्यापक पाठक वर्ग के लिए लिखता है, किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, लेकिन फिर भी लिखते हुए कुछ लोग दिमाग में रहते हैं कि यह जो लिखा जा रहा है, उन्हें कैसा लगेगा, रेणु मेरे लिए ऐसी ही उपस्थिति थे। हमारे लिए प्रभाष जी वैसी कसौटी थे, और लगता है कि उनके निधन के बाद भी वे बने रहेंगे।

प्रभाष जी की उपस्थिति इतनी हल्की नहीं है कि यूं ही किसी के जीवन से चली जाए। ऐसा नहीं कि प्रभाष जी के सब प्रशंसक ही थे, उनको नापसंद करने वालों और उनसे नाराज़ रहने वालों की तादाद भी कम नहीं थी। यह भी प्रभाष जी के व्यक्तित्व और पत्रकारिता की एक विशिष्टता थी, उनका कहना होता था कि पत्रकारिता में स्पष्ट पक्ष लेना चाहिए। किसी विषय पर लिखते हुए पहले दिमाग में साफ होना चाहिए कि हमारा स्टैंड इस मुद्दे पर क्या है। शुरू में ही अपना स्टैंड साफ करो, साफ लिखो और फिर आगे उसकी विस्तार में व्याख्या करो। अपने अग्रज और मित्र राजेन्द्र माथुर के प्रति उनके मन में गहरी आत्मीयता और सम्मान था लेकिन उनके समन्वयवादी दृष्टिकोण से प्रभाष जी की असहमति थी। प्रभाष जी पक्ष लेते थे और उसके लिए जूझ जाते थे। वे स्वभाव से एक्टिविस्ट पत्रकार थे, इसलिए उन्होंने खूब सारे दुश्मन बनाए।

लेकिन इसके अलावा बहुत सी चीजें थीं, जो उन्हें महान पत्रकार बनाती थीं। पत्रकारिता में उम्र गुजार चुकने के बाद हम अपने को कितना ही तुर्रम खान मान लें, प्रभाष जी किसी भी दिन हमें चार नई चीजें सिखा सकते थे। वे असाधारण कॉपी एडिटर थे, खराब से खराब कॉपी को सुधार कर शानदार बना सकते थे, कई प्रतिष्ठित पत्रकारों की प्रतिष्ठा में प्रभाष जी के कॉपी संपादन का बड़ा योगदान है। वे पलक झपकते हेडिंग सुझा सकते थे, खबरों की समझ उनकी कमाल की थी। वे एक के बाद एक संपादकीय और लेख अलग-अलग विषयों पर लिख सकते थे, पेज बनवा सकते थे और तमाम उद्दंड और अराजक लोगों से मजे-मजे में अखबार निकलवा सकते थे। उनके लेखन से यह लग सकता है कि वे काफी पुरातनपंथी संपादक थे। इसके उलटे वे कुछ नया करने के जबर्दस्त समर्थक थे। ‘जनसत्ता’ ने हिंदी पत्रकारिता के जितने ढांचे तोड़े हैं, उतने किसी और अखबार या पत्रिका ने नहीं तोड़े। कई नई प्रवृत्तियां जो आज हिंदी पत्रकारिता में दिख रही हैं उनको शुरू करने या मजबूत करने में उन्हीं की भूमिका है। बोलचाल की भाषा, चुटीले शीर्षक, जनरुचि की खबरों को महत्व देना उनकी विशेषता थी।

उनके दिमाग में नए जमाने के नए अखबार की योजनाएं चलती रहती थीं, उनकी योजना में सिर्फ अखबार का स्वरूप नहीं होता था, बल्कि उसके ढांचे, अर्थव्यवस्था, मार्केटिंग सबके लिए कुछ नए विचार होते थे। भविष्य के अखबार के लिए उनकी कल्पना ऐसे ढांचे की थी, जिसमें संवाददाता, डेस्क, फीचर, वैचारिक लेखन करने वालों के बीच स्पष्ट सीमारेखाएं न हों। वे ऐसे पत्रकार की कल्पना करते थे, जो एकआयामी न हो, जो एक संपूर्ण पत्रकार हो, जैसे कि वे खुद थे। अनेक विषयों में रुचि लेने वाले लोग उन्हें पसंद थे, ‘मुत्फन्नी’ उनका प्रिय शब्द था। उनके लिए परंपरागत राजनीति भी महत्वपूर्ण थी, परिवर्तनकामी राजनीति में उनका यकीन था, उनके लिए खेल, फिल्मों और संगीत की भी बहुत महत्वपूर्ण जगह थी। अपनी टीम के वे सच्चे नेता थे जो टीम के छोटे से छोटे आदमी के लिए किसी बड़े से बड़े आदमी से जूझ जाएं।

इसके बावजूद ऐसा नहीं है कि वे सरल आदमी थे, वे काफी टेढ़े और जटिल थे। वे यह बात जानते भी थे और इसे बदलना नहीं चाहते थे। उनका मानना था कि हर आदमी को अपने स्वभाव के अनुसार चलना चाहिए। उनके पास व्यवहार आधारित नृवंशशास्त्र (बिहेवियोरल एंथ्रोपोलॉजी) की कई किताबें थीं और उनके आधार पर वे अपने को उचित ठहराते थे। लेकिन उनका बड़प्पन यह था कि वे दूसरे को भी इसकी पूरी छूट देते थे और उसका व्यवहार भी बर्दाश्त करते थे। एक बार एक निजी प्रसंग में उन्हें मेरा व्यवहार गलत लग रहा था, उसका उन्होंने जिक्र किया और अंत में कहा- ‘खैर, हर व्यक्ति को अपने तरह की मूर्खता करने का और उसका फल भोगने का अधिकार है।’ इसी समझ की वजह से उनके रिश्ते कभी नहीं बिगड़ते थे, क्योंकि दूसरों को वे उनकी ही शर्तो पर समझने की कोशिश करते थे। उनसे स्थायी तौर पर रिश्ते बिगाड़ना तकरीबन असंभव था। इसलिए वे जिन लोगों के खिलाफ तीखा लिखते थे, उनसे भी उनकी व्यक्तिगत आत्मीयता बनी रहती थी, लेकिन यह आत्मीयता उनके लिखने में कभी बाधक नहीं होती थी।
यह समझ उनके लेखन में इतनी स्पष्ट नहीं होती, क्योंकि वे मानते थे कि लेखन में वह स्पष्ट स्टैंड लेना है जो समाज के लिए जरूरी है। मसलन वे आजकल बाजार में पत्रकारिता के प्रभाव और उससे आई गिरावट से काफी दुखी थे और इस पर लिख भी रहे थे। लेकिन एक स्तर पर उठ कर वे यह भी देख लेते थे कि यह गिरावट एक बदलाव और उथल-पुथल की वजह से है और आगे चलकर स्थितियां बेहतर होंगी। वे यह मानते थे कि चूंकि पत्रकारिता में अचानक विस्तार हुआ, बड़ा पैसा आया है, इसलिए काफी अमर्यादा का माहौल है, लेकिन यह स्वाभाविक है। उनके शब्दों में ‘शुरू की लूट तो लंडूरे ही करते हैं।’ लेकिन उन्हें यकीन था कि आगे चल कर पत्रकारिता की मर्यादाएं, संस्कार अपनी जगह बनाएंगे और आम जनता के प्रति जवाबदेही फिर स्थापित होगी। इसी यकीन की वजह से वे दुष्प्रवृत्तियों से पूरे उत्साह और दमखम से लड़ रहे थे। हम यकीन कर सकते हैं कि अंतिम सांस तक उनका उत्साह और यकीन टूटा नहीं होगा।

लेखक ‘हिन्दुस्तान’ में एसोशिएट एडिटर हैं
rajendra.dhodapkar@hindustantimes.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:पत्रकारिता की कसौटी थे प्रभाष जोशी