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कुछ कहते हैं ये चुनाव नतीजे

हर चुनाव के बाद हमें सोच-विचार करना चाहिए कि आखिर जनता ने क्या फैसला किया है? और ये चुनाव आनेवाले वक्त में क्या असर डालेंगे? हाल ही में तीन राज्यों के चुनाव हुए। आमतौर पर माना जा रहा था कि कांग्रेस आसानी से अरुणाचल प्रदेश और हरियाणा को जीत लेगी। महाराष्ट्र में अपने सहयोगियों के साथ सरकार बना लेगी।

अरुणाचल के मामले में कांग्रेस आराम से जीत गई। वहां पर 73 फीसदी वोट पड़े। उससे अपने पड़ोसी चीन को एक संदेश साफ-साफ गया कि अरुणाचली खुद को हिंदुस्तानी समझते हैं। हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा सरकार बनाने में कामयाब तो हो गए। लेकिन उन्हें उसके लिए निर्दलीयों की मदद लेनी पड़ी। उनके विरोधी ओमप्रकाश चौटाला को एक बार यह साबित करने का मौका मिल गया कि वह अभी चुके नहीं हैं। लेकिन भजनलाल अब सचमुच ढल गए हैं। असली मुकाबला तो अपने सबसे अमीर राज्य महाराष्ट्र में था। जैसा कि अंदाज था बीजेपी और शिवसेना का ढलान जारी रहा। अब बाला साहेब ठाकरे का जलवा खत्म हो चुका है। उनके बेटे उद्धव ठाकरे में कोई जान नहीं है। सबसे खराब बात राज ठाकरे का उठना है। वह नफ़रत के सौदागर और अलगाववादी हैं। नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती राज का मुंह बंद रखने की होगी। कांग्रेस की बल्ले-बल्ले के पीछे क्या है? उनके लगातार आगे बढ़ने की वजह सोनिया गांधी हैं। उन्होंने साबित किया है कि वह बेहतरीन नेता है। कमाल का संगठन चला सकती हैं। वह जो भी बोलती हैं, नपा-तुला होता है। उनके फैसले काफी सोच समझ कर होते हैं। यही बात आप राहुल के बारे में भी कह सकते हैं। हालांकि अपने इलीट वंशवाद को खूब कोसते मिलते हैं। लेकिन राहुल ने अभी तक कोई गलत कदम नहीं उठाया है। न ही वह और न उनकी मां पर कोई किसी किस्म के भेदभाव का आरोप लगा सकता है। कांग्रेस पार्टी को लोग पसंद कर रहे हैं, तो उसकी एक वजह मनमोहन सिंह हैं। उन्हें लोग अपने बुजुर्ग की तरह लेते हैं। उन पर पूरा भरोसा करते हैं। प्रधानमंत्री के पद पर उनके होने से सभी सहज महसूस करते हैं। आगे क्या होना है? केंद्र में कायदे की विरोधी पार्टी नहीं है। भगवा ब्रिगेड और लाल वामपंथियों ने खुद को ही बर्बाद कर लिया है। उससे चीजें बिगड़ सकती हैं। कायदे की आलोचना के बिना सत्तारूढ़ पार्टी बेलगाम हो सकती है। हालांकि लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज अब भी हैं, लेकिन उनकी बात का असर बेहद कम हो गया है। मुझे लगता है कि विरोध की असली आवाज तो अरुण जेटली और जसवंत सिंह हैं। वे पूरी तैयारी के साथ बोलते हैं। छोटे-छोटे मुद्दों पर बेवजह चीखते-चिल्लाते नहीं हैं। फिर उन्हें इज्जत के साथ सुना भी जाता है।

प्लेबॉय
मैं जब भी बाहर जाता हूं, तो ‘प्लेबॉय’ जरूर खरीदता हूं। अपने देश में आने वाले दोस्तों से भी मैं कहता हूं कि उसकी एक कॉपी लेते आएं। इस मैगजीन पर हिंदुस्तान में पाबंदी लगी हुई है। यहां की सरकार उसे अश्लील मानती है। जाहिर है मैं अपने नैतिकता के ठेकेदारों से सहमत नहीं हूं। सचमुच उसमें लड़कियों की नंगी तसवीरें होती हैं। लेकिन उसमें बहुत अच्छे लेख भी होते हैं। बेहतरीन कहानियां, इंटरव्यू, काटरून और गजब के चुटकुले होते हैं। असल में वह मैगजीन श्रृंगारिक तो है, उसमें हल्का-फुल्का मसाला तो होता है, लेकिन उसे अश्लील के खांचे में नहीं डालना चाहिए। ‘प्लेबॉय’ से ज्यादा अश्लील तो कई मैगजीन हैं, उन्हें मुझ जैसा गंदा आदमी भी नहीं पढ़ पाता। एक वक्त मैं अमेरिका में था। मैंने उसका एक साल का चंदा भी दे दिया था। मैंने उनके संपादक को लिखा था कि मुझे कॉपी भेज दो लेकिन उसके पैकेट पर मैगजीन का नाम मत लिखना। उन्होंने मेरी शर्त मानने से मना कर दिया था। इसीलिए जब पहली कॉपी आई, तो कस्टम से एक चिट्ठी मिली। उसमें लिखा था कि पैकेट में अश्लील साहित्य है। मैंने विरोध करते हुए लिखा था यह अश्लील नहीं है। और कोई अगर मुझे भेज रहा है, तो मैं कहां गलती पर हूं? मुझे पूरा भरोसा है कि कस्टम वालों ने भी उसका भरपूर मजा उठाया होगा। बाद में उसे अच्छे खासे दामों में बेच भी दिया होगा। हालांकि मुझे प्लेबॉय पसंद है, लेकिन उनके संपादक ह्यू हेफनर को नहीं चाहता। हाल ही में उन्होंने लॉस एंजलिस के अपने मैंशन में 83वां जन्मदिन मनाया। उसमें मैगजीन में कभी छप चुकी तीन लड़कियां बुलाई गई थीं। वे उनकी पोतियों जैसी होंगी लेकिन उनसे फ्लर्ट कर रहे थे हेफनर। वह भी पूरे सात दिन तक। मुझे खराब लगा। आखिर ये बूढ़ा आदमी क्या कर रहा है?

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