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ग्रामगीता के संत

आखिर महाराष्ट्र सरकार को याद आ गई और राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज स्वतंत्रता संग्रामी हो गए। चलिए अपने जन्मशती वर्ष में यह तमगा भी मिल गया। दो तीन दिन पहले यह खबर आई थी। लोगों ने उन्हें राष्ट्रसंत मान ही लिया था, तब स्वतंत्रता संग्रामी बना देने से महाराज की शख्सीयत पर क्या असर पड़ना है?
 खबर पढ़ते हुए मुझे बैतूल याद आया। पांच-छह साल पहले एक फेलोशिप के सिलसिले में वहां गया था। वहीं पर मैंने पहले-पहल तुकड़ोजी महाराज के बारे में सुना। वहीं पर मुझे उनकी किताब ‘ग्रामगीता’ दी गई थी। तब मैंने उसे बहुत महत्व नहीं दिया था। लेकिन जब एक दिन उस किताब को पलटा, तब समझा कि महाराज ने क्या लिखा है? वह तो सचमुच गांवों के लिए गीता लिख गए थे। ‘लिखी ग्रामगीता इस कारण ग्रामदेवता जाग्रत हो।’ वह जानते थे कि यह देश गांवों में बसता है। सो उसको वह स्वर्ग बनाना चाहते थे। ऋग्वेद का ‘विश्वपुष्टे ग्रामे अस्मिन्ननातुराम्’ को उन्होंने प्रेरणा ही मान लिया था।

वह तो संत थे। सचमुच भारतीय आत्मा। इसीलिए वह प्रकृति के इर्द-गिर्द ही जीवन को रख कर सोचते थे। गांव अपने स्वभाव से ही प्रकृति के नजदीक होता है। इसीलिए वह गांव पर जोर दे रहे थे। गांव को स्वर्ग बनाने का सपना देख रहे थे और भू-बैकुंठ की स्थापना करना चाहते थे। गांधीजी के आश्रम में बिताए एक महीने ने उन्हें संत के साथ समाजसेवक बना दिया था।
 संत तुकड़ोजी जानते थे कि अपने गांवों में क्या-क्या गड़बड़ियां हैं। वह जानते थे कि जाति धर्म, लिंग, संप्रदाय की कितनी खाइयां वहां हैं। इसीलिए वह कहते हैं, ‘उठो ऐ ईश्वर के अंश, अपनी अनंत संभावनाओं को पहचान। सत्य ही धर्म है, तो धर्म, जाति और लिंग का भेद कैसा? धरती माता पर मालिकी कैसी?’
उनके अंतिम समय में दादा धर्माधिकारी मिलने पहुंचे थे। उन्होंने महाराज से पूछा था, ‘लोगों के लिए आपका क्या संदेश है?’ उनका कहना था, ‘विश्व प्रेम ही सारे रोगों का इलाज है। उसकी शुरुआत गांव के जन-जन से होनी चाहिए।’

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