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सामाजिक विनिवेश

केंद्र सरकार ने मुनाफे में चलने वाली सार्वजनिक कंपनियों के दस फीसदी विनिवेश का जो फैसला किया है वह महज एक ऐसा आर्थिक फैसला नहीं है जो सरकार पर पड़ रहे वित्तीय दबाव की मजबूरी में लिया गया हो। विनिवेश का यह फैसला मूल रूप से सामाजिक क्षेत्र को मजबूत बनाने की सरकार की प्रतिबद्धता को भी दिखाता है। सामाजिक क्षेत्र के लिए सरकार के कार्यक्रमों पर पिछले काफी समय से सवाल खड़े किए जा रहे थे। यह कहा जा रहा था कि अगर इन सारे कार्यक्रमों को लागू किया जाता है तो वित्तीय घाटा काफी तेजी से बढ़ेगा। यह भी डर था कि योजनाएं शुरू कर देने से वित्तीय घाटा तो आसमान पर पहुंचेगा ही, फिर संसाधन अधिक न होने के कारण ये योजनाएं भी आधी-अधूरी पड़ी रह जाएंगी। लेकिन सामाजिक क्षेत्र पर खर्च करने के लिए विनिवेश के ताजा फैसले ने इस चिंता से मुक्ति दे दी है। हालांकि अभी तक जो वित्तीय घाटा है उसमें ज्यादा कमी शायद नहीं ही आएगी क्योंकि इस विनिवेश से जो पैसा आएगा उसका सीधे सामाजिक क्षेत्र में निवेश कर दिया जाएगा। उसका इस्तेमाल किसी भी तरह से वित्तीय घाटे को संतुलित करने में नहीं किया जा सकेगा। लेकिन फिर भी यह विनिवेश केंद्रीय वित्त पर पड़ रहे दबाव को तो घटाएगा ही। वैसे भी सार्वजनिक कंपनियों का विनिवेश करके उससे हासिल धन का समाज में निवेश करना ज्यादा अच्छे और दूरगामी नतीजे देगा, बजाय इसके कि उसका इस्तेमाल सालाना घाटे की भरपाई में किया जाए। विनिवेश के इस फैसले के बाद यह व्यवस्था बनाना बहुत जरूरी है कि समाज के जिन तबकों के लिए यह निवेश किया जाएगा, उन तक यह पैसा पहुंचे भी। इसका ज्यादातर हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। इस मौके पर कई अर्थशास्त्री सरकार के वित्तीय जिम्मेदारी अधिनियम की बात कर रहे हैं, इस पर ध्यान देने की जरूरत है सरकारी धन ठीक से खर्च हो इसकी जिम्मेदारी तय करने का वक्त भी आ गया है।
सरकार में शामिल तृणमूल कांग्रेस ने विनिवेश की इस योजना का विरोध कर यह तो बता दिया है कि इस विनिवेश की राजनैतिक राह भी आसान नहीं है। बावजूद इसके कि सरकार का इरादा सिर्फ दस फीसदी विनिवेश का ही है और सिर्फ इतने से ही किसी सार्वजनिक कंपनी का निजीकरण नहीं होने जा रहा है। पिछली सरकार ने जब नेवेली लिग्नाइट कार्पोरेशन के विनिवेश की योजना बनाई थी तो द्रमुक ने सरकार गिराने की हद तक आंखें तरेरनी शुरू कर दी थीं। ऐसे दबाव सरकार को आगे भी झेलने पड़ सकते हैं।

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  • Web Title:सामाजिक विनिवेश