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सचिन का नया शिखर

सचिन तेंदुलकर के नाम इतने रिकॉर्ड दर्ज हो चुके हैं कि अब उनके नए रिकार्ड कोई खास उत्सुकता नहीं पैदा करते लेकिन उन रिकार्डो के साथ जो खेल के रोमांचक और नाटकीय क्षण जुड़े होते हैं, वे सचमुच उन रिकार्डो को दिलचस्प और स्वर्णिम बनाते हैं। सचिन के 17,000 रन इसलिए लोगों को याद रहेंगे कि वे एक ऐसी पारी में बने, जिसमें भारत ने ऑस्ट्रेलिया के 350 रनों के लक्ष्य को पार करने में लगभग सफलता पा ली थी। यह पारी इसलिए भी नाटकीय हुई, क्योंकि भारतीय टीम लक्ष्य से जरा पीछे ठिठक गई। ऐसे क्षणों का महत्व इसलिए है, क्योंकि इनसे पता लगता है कि तमाम व्यवसायीकरण के बावजूद खेल का अपना स्वभाव है और ऐसे मैचों का फैसला कुछ भी हो, जीतता खेल है। जो टीम पिछले मैच में 250 रन का लक्ष्य नहीं पा सकी थी, उससे यह उम्मीद कम ही लोगों को होगी कि वह 350 रन बनाने की कोशिश भी कर सकती है। लेकिन ऐसा हुआ और यह सचिन तेंदुलकर की शानदार 175 रन की पारी की वजह से हुआ। इस पारी ने यह दिखा दिया कि बढ़ती उम्र और बार-बार चोटों से प्रभावित शरीर के बावजूद सचिन को अगर कोई चीज चला रही है तो वह पैसा या नाम नहीं, खेल के प्रति लगन और जुड़ाव है। न कोई सिर्फ पैसे या नाम के लिए 17,000 रन बना सकता है, न ही ऐसी शानदार पारी खेल सकता है, जैसी सचिन ने खेली। यह एक असाधारण प्रतिभाशाली खिलाड़ी की प्रतिभा की अभिव्यक्ति थी और आश्चर्य नहीं कि सचिन के साथ सभी सहमत होंगे कि यह उनकी सर्वश्रेष्ठ पारियों में से एक थी। 17,000 रन तो उन्होंने तभी पूरे कर लिए थे, जब उन्होंने सात रन बनाए थे, तब सामने सहवाग धुआंधार कर रहे थे और सचिन संयम के साथ खेल रहे थे। इस पारी का असली रोमांच उसके बाद शुरू हुआ और उस रोमांच ने यह बता दिया कि अगर खेल में ऐसा रंग हो तो एकदिवसीय क्रिकेट की लोकप्रियता कम नहीं होगी। लेकिन शर्त यह है कि एकदिवसीय क्रिकेट डेली वेजेज की नौकरी की तरह नीरस न हो। सचिन में आज भी वही उत्साह है, जो बीस साल पहले था, जब उनके नाम पहले हजार रन नहीं जुड़े थे और यह उत्साह और लगन इस नए रिकॉर्ड को भी स्मरणीय बनाती है।

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