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विश्वविद्यालयों की राजनीति में कला

हाल ही में हिन्दुस्तान में यह खबर पढ़ने को मिली कि गुरु-शिष्य परंपराओं पर आधारित शास्त्रीय कलाओं को अब पारंगत उस्ताद ही विश्वविद्यालयों में पढ़ाएंगे। इससे जहां उस्तादों को धन की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा, वहीं ज्यादा अच्छे ढंग से प्रशिक्षित लोग निकलेंगे। लेकिन मेरे विचार से ये कलाएं ऐसी हैं जिनमें बिना गुरु शिष्य परंपरा के निखार लाना मुमकिन नहीं। इसके लिए साधना, समर्पण, श्रद्धा और संयम की जरूरत होती है। विश्वविद्यलयों में जिस तरह की राजनीति होती है, उसमें ये भावनाएं नहीं पनप सकतीं। अनुशासन और आदर की कमी से वहां कलाओं का विकास नहीं हो पाएगा। यह तभी हो सकता है, जब शिक्षकों को गुरु की तरह सम्मान दिया जाए।
इंदिरा सदावर्ती, 204, राजा गार्डन, नई दिल्ली 110015

महिला आयोग में हो सीधी शिकायत
भारत सरकार तथा उसके साथ-साथ विभिन्न राज्यों के द्वारा महिला आयोग की स्थापना की गई है। इस प्रकार से विभिन्न कार्यालयों में काम करने वाली महिलाओं के साथ इस प्रकार से कोई दुर्व्यवहार, या फिर अन्य अत्याचार की शिकार हो जाने के पश्चात उसकी शिकायत करने की व्यवस्था सीधी होनी चाहिए, ताकि इस प्रकार से अपने विषय में जो भी व्यवहार हुआ है, उसकी शिकायतें राष्ट्रीय महिला आयोग में कर सकें। परंतु इस प्रकार से उसको इससे पहले विभाग को भी शिकायत पत्र देना पड़ता है। जिसके कारण विभाग के द्वारा उसको आग बढ़ाने पर उसको मेमों दे दिया जाता है।
वीना रानी टांक,
हिन्दु कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

सटोरियों से महंगाई
जिस गति से महंगाई बढ़ रही है उससे तो अब लगने लगा है कि बाजारों पर सटोरियों की पकड़ पूरी तरह से बनी हुई है। जब चाहे जो जिन्स उसे बढ़ा देते हैं। महंगाई का आलम यही रहा तो आम आदमी को दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाएगा। समाज के एक बड़े तबके को बिना तरकारी के चटनी से रोटी खाने के लिए विवश होना पड़ेगा।
दिनेश गुप्त
कृष्ण गंज, पिलखुवा, उत्तर प्रदेश
बेसुरे दिन
कैसे बेसुरे दिन आए,
थैले ने
कुछ सुर छेड़े,
जेब ने
कुछ अलग
गीत गाए।
वीरेन कल्याणी,
विश्वास नगर, शाहदरा, दिल्ली

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