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आधुनिकता से भोजपुरी लोकगीतों को खतरा

आधुनिकता के असर से जीवन का कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रह गया है। इसकी वजह से हमारी लोककलाएं और लोकगीत भी धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं। भोजपुरी लोकगीतों पर भी इस आधुनिकता का असर देखने को मिल रहा है।

भोजपुरी लोकगीतों की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि इनका अस्तित्व आज भी बचा हुआ है, लेकिन समय रहते इनके संरक्षण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो उनके विलुप्त होने में समय नहीं लगेगा। भोजपुरी बोली का एक व्यापक क्षेत्र है और यह देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बडी संख्या में बोली जाती है, लेकिन आधुनिकता की हवा में इस पर विलुप्त होने का खतरा मंडराने लगा है।

भोजपुरी का पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार के एक बहुत बड़े क्षेत्र में प्रसार है। भारतीय प्रवासियों के साथ यह मारीशस तथा त्रिनिदाद एवं टोबैगो समेत अन्य देशों में भी पहुंची है। भोजपुरी बोली का प्राण इन क्षेत्रों में गाए जाने वाले भोजपुरी लोकगीत हैं। भोजपुरी लोकगीतों ने समग्र जीवन के अनेक अंगों-उपांगों को अपने भीतर समेटने का उपक्रम किया है। चाहे गर्मी हो या बरसात, विवाह हो या जन्मोत्सव, व्रत हो या त्योहार, मेला हो या तीर्थ, देवी हो या देवता, युद्ध हो या श्रम सभी में इसकी पैठ है और जीवन के हर कोने में इसका स्पर्श है।

भोजपुरी लोकगीतों का विकास होता रहा है। लोकगीतों में लोक संस्कृति घुल-मिलकर एक पीढी़ से दूसरी पीढी़, दूसरी से तीसरी पीढी़ और इसी तरह पीढी़ दर पीढी़ गतिशील बनी रही, लेकिन आधुनिकता इसे धीरे-धीरे निगल रही है। स्थिति तो यहां तक आ गई है कि इस परम्परा को बढा़ने के लिए पुराने लोग बचे नहीं हैं और नए लोगों में इसे सीखने की ललक नहीं है।

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