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स्मार्ट मनी के 20 सूत्र

हमारी जिंदगी का शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता होगा, जब हमें फाइनेंस संबंधी कोई फैसला न करना पड़ता हो - यह क्रेडिट कार्ड स्वाइप करना, इंश्योरेंस पॉलिसी की खरीद या ऐसा ही कुछ और काम हो सकता है। इन्हें लेकर कुछ बातें तो सबके सामने ओपन हैं, लेकिन सही फैसला करने के लिए काफी चीजें बड़ी सावधानी से खुद ही चेक करनी पड़ती हैं।

बिल्डर और ब्रोकर से संबंधित
1 जितना सोचेंगे, जगह उससे कम ही मिलेगी: बिल्डर के विज्ञापन में जितनी जगह का वादा किया जाता है, वह कैलकुलेशन के नजरिए से सुपर बिल्ट-अप एरिया होता है, लेकिन हकीकत में हमें कारपेट एरिया ही मिलता है, जो बिल्डिंग की डिजाइन के हिसाब से तकरीबन वादे से तकरीबन 30 प्रतिशत कम होता है।

2 ऑल-इंक्लूजिव कीमत में पेंच: ज्यादातर मामलों में संपत्ति का विज्ञापित मूल्य उसकी लागत होती है। लेकिन इसके अलावा और भी पैसा देना पड़ता है- जैसे कि कार पार्क, क्लब मेंबरशिप, बिजल-पानी का कनेक्शन वगैरह वगैरह। इन्हें जोड़ने पर काफी बड़ी रकम बन जाती है। और ये भी हो सकता है कि आपको विज्ञापित कीमत का दोगुना तक भुगतान करना पड़ जाए।

3 प्रोजेक्ट में देरी का मुआवजा: आमने-सामने की बातचीत में यह मसला कभी नहीं उठेगा, लेकिन बिल्डर आपसे जिस सेल एग्रीमेंट पर साइन करवाता है, उसमें इसका जिक्र जरूर होता है। आमतौर पर ये मुआवजा बराए नाम ही होता है। जैसे कि 5 रुपए प्रति वर्ग फीट प्रति माह। लेकिन मजे की बात ये है कि प्रोजेक्ट की समय सीमा और सुपुर्दगी का तरीका सेल एग्रीमेंट में अक्सर दर्ज नहीं किया जाता।

4 ब्रोकरेज फीस पर मोलभाव: उत्तर भारत में किराए पर मकान लेने पर दलाल को आमतौर पर एक महीने का किराया, और अपार्टमेंट की खरीद पर विक्रय मूल्य का एक प्रतिशत देना पड़ता है। बूम टाइम में इस फीस पर दलाल कोई मोलभाव नहीं करते थे, लेकिन जनवरी 2008 से मंदी की हवा शुरू होने के कारण बिल्डर इसे कम करने के लिए भी राजी होने लगे हैं।
क्रेडिट कार्ड कंपनियों से संबंधित
5 ग्लोबल कार्ड कंपनियों में हिडेन चार्जेज: जब आप विदेशी मुद्रा में भुगतान के लिए क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं, तो आपको एक्सचेंज रेट से ज्यादा देना पड़ता है। मिसाल के तौर पर, आपको कुल रकम का साढ़े तीन प्रतिशत क्रॉस करेंसी चार्जेज, चार्ज रकम का 10.35 प्रतिशत सर्विस टैक्स और ऊपर से इस पर तीन प्रतिशत एजुकेशन सेस भी अदा करना पड़ेगा। इस तरह भुगतान आपके अंदाजे से ज्यादा का हो जाएगा।

6 कैशबैक कार्ड की अपर लिमिट: इसका मतलब यह नहीं है कि जितना ज्यादा खरीदोगे, उतना ही ज्यादा पैसा वापस पाओगे। आपको इस मद में 500 रुपए प्रतिमाह से ज्यादा नहीं मिलने वाला। कुछ कार्डस तो इस सुविधा को हासिल करने के लिए न्यूनतम स्टेटमेंट रकम की शर्त भी लगा देते हैं। यह रकम प्रति मान्य ट्रांजेक्शन अधिकतम ढाई सौ रुपए निर्धारित की जा सकती है- और इसमें कर्ज और कैश एडवांस को शुमार नहीं किया जाता।

7 ड्यू डेट अंतिम तिथि नहीं: अगर आप सोचते हैं कि ड्यू डेट का मतलब भुगतान की आखिरी तारीख है, तो आप गलती पर हैं। असल में यह वो तारीख है जिससे पहले-पहले रकम आपके कार्ड एकाउंट में जमा हो जानी चाहिए। वरना आपको डिफाल्टर मान लिया जाएगा। इससे बचने के लिए चेक पेमेंट चार दिन पहले ही करना होता है।

8 कैश निकालने पर दैनिक ब्याज: आप अपने क्रेडिट कार्ड की कैश लिमिट के हिसाब से बैंक या एटीएम से नकद रकम भी निकाल सकते हैं। इसके लिए आपको निकाली गई रकम का निश्चित प्रतिशत वन-टाइम फीस के तौर पर देना होगा। या फिर कोई न्यूनतम रकम भी निर्धारित हो सकती है। ऊपर से निकाली गई रकम जमा करने तक, उस पर हर दिन के हिसाब से ब्याज भी देना पड़ता है। इतना ही नहीं, कई कार्डस में तो ब्याज-मुक्त अवधि भी नहीं होती, जैसी कि कार्ड पर खरीद के मामले में होती है।
ऑनलाइन रिटेलर से संबंधित
9 फ्री शिपिंग का मतलब मुफ्त नहीं: शिपिंग की लागत ऑन लाइन खरीद में आपको बहुत महंगी पड़ सकती है। इसमें एक गुप्त शर्त यह भी होती है कि केवल एक तय रकम से ऊंची कीमत की खरीद करने पर ही शिपिंग चार्जेज नहीं लिया जाएगा। इसका मतलब ये भी होता है कि विज्ञापन में दिया गया ‘सभी सामान पर’ शिपिंग चार्जेज माफ करने का नियम हकीकत में आपके बिल की कुल रकम, पहले से तय न्यूनतम सीमा से ज्यादा होने पर ही लागू होगा।

10 पैसा हम लौटा देंगे, मगर शिपिंग चार्ज आपको देना होगा: इसे अच्छी तरह जांच लें। टोटल रिफंड की बात सही विकल्प हो सकता है। लेकिन यह जांच लें कि डिफेक्टिव सामान आने पर उसे वापस करने का शिपिंग चार्ज आप चुकाएंगे या कंपनी।

11 फर्जी खरीदार बढ़ा देते हैं नीलामी की बोली: कौन कहता है कि ऑनलाइन बिजनेस में फर्जीवाड़ा और घपला नहीं होता? किसी माल के ऑनलाइन ऑक्शन में बोली लगाने के लिए खरीदारों की नकली आईडी बनाकर नेट पर उनकी फौज खड़ी कर देना विक्रेताओं के लिए कोई मुश्किल काम नहीं होता। इनके जरिए कीमत ऊंची से ऊंची लगवाकर, आपको और ऊंची बोली लगाने के लिए फुसलाया जाता है।

बीमा एजेंट से संबंधित
12 टर्म प्लान से ज्यादा कमीशन यूनिट-लिंक्ड-इंश्योरेंस-प्लान यानी युलिप देता है: टर्म प्लान जीवन बीमा के सबसे सस्ते मगर सबसे ज्यादा कवरेज देने वाले प्रोडक्ट होते हैं। कम प्रीमियम का मतलब है एजेंट का कम कमीशन। टर्म प्लान को बेचने में दिक्कत ज्यादा आती है, क्योंकि वे न तो प्रीमियम वापस करते हैं और न ही मियाद पूरी होने पर किसी तरह की रिटर्न देते हैं। कई लोगों के लिए इनके बारे में पहले से कोई अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता है, चूंकि ज्यादातर निवेशक इंश्योरेंस-कम-इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट्स पर पैसा वापस पा लेने के आदी होते हैं। इसीलिए एजेंट हाई-प्रीमियम यूलिप्स बेचने को ही प्राथमिकता देते हैं।

13 जल्दी निकालने पर यूलिप्स महंगी पड़ेंगी: अगर आप यूलिप्स को 10 साल से भी पहले निकाल रहे हैं, तो इनसे मुनाफे की उम्मीद न करें। क्योंकि शरुआती सालों में अपफ्रंट चार्जेज ज्यादा लगते हैं, और इसकी वजह से प्रीमियम का छोटा हिस्सा ही निवेश हो पाता है। अगर आप हाई-इक्विटी एक्सपोज़र वाले ग्रोथ-ऑप्शन में निवेश कर रहे हैं, तो इससे जल्दी बाहर आने में आप ज्यादा ही नुकसान में ही रहेंगे- खासकर इस मंदी के दौर में। आपसे तीन या पांच साल बाद (कम नेट-असैट-वैल्यू पर) नई यूलिप खरीदने या अतिरिक्त नए फीचर्स वाली यूलिप लेने के लिए भी कहा जा सकता है। मगर ऐसा न करें। इसके बजाय मौजूदा यूलिप को ही टॉप-अप फीचर के साथ चलते रहने दें, ताकि दीर्घ अवधि में अधिकतम रिटर्न मिल सके।
 
14 कैपिटल और रिटर्न गारंटी की कीमत: जो यूलिप्स मूल निवेश या रिटर्न की गारंटी देती हैं, उन्हें अपना वादा निभाने के लिए कुछ पक्का इंतजाम करना पड़ता है। इसके लिए अतिरिक्त लागत ग्राहक से ही वसूली जाती है। यही नहीं, ज्यादातर गारंटी प्लान्स में बीमा कंपनियां सौ प्रतिशत तक शेयर मार्केट में निवेश कर सकती है। आपके पास फंड ऑप्शन की आजादी नहीं होती, क्योंकि आप सिर्फ शेयर में ही निवेश कर सकते हैं।

15 एंट्री कॉस्ट कुछ नहीं, मगर मासिक शुल्क कई हैं: कई यूलिप्स की कोई जाहिर लागत नहीं होती, और हर साल का पूरा प्रीमियम निवेश करने की बात की जाती है। लेकिन ऐसी सभी योजनाओं में, प्रीमियम के बजाय आपके फंड से पैसा चार्ज करने का प्रावधान होता है। हालांकि यह रकम फंड वैल्यू का मामूली प्रतिशत ही होती है, लेकिन आगे चलकर इसका असर कमोबेश वही होता है, जो फंड वैल्यू बढ़ते रहने पर होता है।

सुपर मार्केट से संबंधित
16 डिस्काउंट खामख्वाह बढ़ाई गई कीमत पर मिलता है: अगर आप ‘सेल’ के दीवाने हैं, तो आपके लिए यह बुरी खबर है। गैर ब्रांडेड प्रोडक्ट्स, खासकर कपड़ों के बारे में आम चलन यही है। इसलिए अगर आपको माल की असली प्री-डिस्काउंट कीमत का अंदाजा नहीं है, तो इसके झांसे में कतई न आएं। डिस्काउंट का प्रतिशत जितना ज्यादा हो, आपको उतना ही ज्यादा शक करना चाहिए।

17 एमआरपी से कम पर भी खरीद मुमकिन है: आपको पता होना चाहिए कि एमआरपी का मतलब ‘अधिकतम खुदरा मूल्य’ होता है। अर्थात् विक्रेता को ज्यादा से ज्यादा उस सीमा तक कीमत वसूलने की छूट दी गई है। लेकिन इससे कम कीमत लेने से उसे कोई भी कानून रोकता नहीं है। इसलिए आप पूरे हक से एमआरपी पर अलग से छूट की मांग कर सकते हैं। इससे आपको माल सस्ता मिल सकता है। खासकर नकद भुगतान करके ऊंची कीमत वाला सामान, जैसे कि टीवी सैट या फर्नीचर खरीदते वक्त।  

टूर ऑपरेटर से संबंधित
18 हमारी कोटेशन प्राइस ‘टैक्स से पहले’ है: हवाई भाड़े पर टैक्स, बेस-फेयर का 30 से 50 प्रतिशत तक हो सकता है। और अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों में तो टैक्स आपकी जेब पर और भी भारी पड़ता है। इसलिए टूर ऑपरेटर से, खासकर सुपरसेवर ऑफर में साफ-साफ समझ लें कि इसमें क्या शामिल है, और क्या नहीं।

19 डॉलर में भाड़े का कुछ हिस्सा कम-ज्यादा हो सकता है: एक्सचेंज रेट में आपको भारी पड़ने वाला कोई भी बदलाव टूर आपरेटर आपसे नहीं छिपाएगा, लेकिन विपरीत स्थिति में नहीं। इसलिए अगर रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत हो रहा है, तो आप मोलभाव कर भाड़ा कम करवा सकते हैं।

20 खुद अरेंज करने पर ‘ऑप्शनल’ टूर किफायती होता है: ‘ऑप्शनल’ यानी आपकी पसंद वाले स्थानों के टूर के लिए आपरेटर भारी कीमत वसूल करते हैं। इन डेस्टिनेशंस पर कॉम्बो टूर पैकेज स्थानीय स्तर पर बुक कराने पर सस्ते पड़ते हैं। इसलिए टूर आपरेटर को दरकिनार कर क्यों न आप खुद ही इन्हें अरेंज कर लें?

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