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दर्शकों के सिर चढ़ा ‘रियलिटी’ का जादू

दर्शकों के सिर चढ़ा ‘रियलिटी’ का जादू

केबीसी के बाद बिग बी का बिग बॉस-3 भले ही कितनी आलोचनाओं का शिकार हो रहा हो, पर रेटिंग में वह स्पर्धा कर ही रहा है। हालांकि बिग बॉस सहित तमाम तरह के रियलिटी शोज का बाजार बड़ा बनाने में न्यूज चैनल भी खूब हाथ बंटा रहे हैं। ये समाचार चैनल लोकप्रियता में अपनी भागीदारी बनाए रखने के हथियार के रूप में इन शोज की झलकियां दिखा कर दर्शकों में इन्हें देखने की ललक बढ़ा रहे हैं। बिना हींग फिटकरी के रंग चोखा तो हो ही रहा है।

इन शोज में जहां नए-नए शगूफे छोड़ कर या विवाद उठा कर लोकप्रियता बढ़ाने का उपक्रम होता है, वहीं रियलिटी के नाम पर भी नाटकीयता ज्यादा नजर आती है, फिर वह चाहे राखी का स्वयंवर हो या प्रतिभागियों का आपस में लड़ना-झगड़ना। शोज की बढ़ती लोकप्रियता का एक नतीज यह भी है कि टेलीविजन के आम धारावाहिकों में भी रियलिटी का डोज बढ़ रहा है।

आज अगर हम टॉप टेन धारावाहिकों की सूची को देखें तो उसमें ऐसे धारावाहिक शिखर पर हैं, जिनमें आम जीवन की सच्चई प्राथमिकता पा रही है। इनमें ‘ना आना इस देश लाडो’ हो, ‘बालिका वधू’ या ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’, सबमें वास्तविक जिन्दगी को आधारभूमि बनाने का सिलसिला जोर पकड़ रहा है। आज जो शिखर पर 5 धारावाहिक नजर आ रहे हैं, उन सभी में वास्तविकता को दर्शाने की मानो होड़ सी लगी है। बिदाई, उतरन, छोटी बहू और पवित्र रिश्ता में पात्रों के जरिए आम जिन्दगी से जुड़ी विभिन्न समस्याओं को उठाया ज रहा है। समस्या बाल विवाह की हो या समाज में लड़कियों से जुड़ी, सबको इन धारावाहिकों में स्थान दिया जा रहा है।

गौर करने की बात यह है कि जब बच्चे रियलिटी शोज में लोकप्रियता का हिस्सा बने तो धारावाहिकों में भी वे प्रमुख भूमिकाओं में नजर आने लगे। इस वक्त सभी मनोरंजन चैनल अपने दर्शकों को बढ़ा कर विज्ञापनों के जरिए अधिकाधिक राजस्व जुटाने की होड़ में लगे हुए हैं। बच्चों को रियलिटी शो और धारावाहिकों में लाना भी इसी रणनीति का हिस्सा है। बच्चों के बीच कभी सीरियल शक्तिमान का क्रेज था, लेकिन अब बच्चे वास्तविक खतरों के खिलाड़ी पर फिदा होते हैं। इसी की तर्ज पर संगीत और कॉमेडी के रियलिटी शोज में भी बच्चों की बहार है। बूगी वूगी ने जो बच्चों के जरिए बड़ों जसी हरकतें छोटे परदे पर बड़ी बेशर्मी से कराई थी, वह सिलसिला कॉमेडी शोज में भी बच्चे जारी रखते नजर आ रहे हैं।

रियलिटी शोज और धारावाहिकों में बच्चों के बेज इस्तेमाल की तरफ सरकार की निगाह भी पहुंची है। इस बाबत कुछ दिशा-निर्देश भी दिए गए हैं। ये अलग बात है कि अभी इनका सुचारू रूप से पालन होना बाकी है। बच्चों के संरक्षण से जुड़े राष्ट्रीय आयोग ने एक कमेटी बनाई है, जिसमें कानूनविद, बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ, बाल चिकित्सक और शिक्षाविद शामिल हैं। इस कमेटी का कहना है कि 12 साल से कम आयु के बच्चों के रियलिटी शोज में भाग लेने पर रोक लगनी चाहिए। फिलहाल तो 7-8 साल तक के बच्चे इन शोज का हिस्सा बन रहे हैं। जजों को बच्चों के साथ व्यवहार करने में संयम बरतना चाहिए, ताकि उन्हें किसी प्रकार का मानसिक आघात न पहुंचे।

कुछ शोज की वजह से बच्चों के अस्पताल तक पहुंचने की नौबत आने पर इस ओर ध्यान दिलाया गया है। बच्चे जरूर जीरो से हीरो बनना चाहते हैं और इस खेल में उनके अभिभावक  बच्चों से भी ज्यादा उत्साह दिखाते हैं। इस चक्कर में बच्चों की पढ़ाई का भी भारी नुकसान होता है। सिर्फ प्रतिभागियों का ही नहीं, बल्कि उन करोड़ों बच्चों का भी, जो इन्हें पढ़ाई का वक्त चुरा कर देख रहे हैं। इन शोज में कमाई बढ़ाने के लिए बनावटी सनसनी न ही डाली जाए तो बेहतर होगा।

ऐसे ही रचनात्मक शोज से जुड़े रहे सिद्धार्थ बसु की राय में बच्चों पर अधिक दबाव डालने से बचना चाहिए। खुद टीवी चैनलों को इस बारे में आचार संहिता बनानी चाहिए, ताकि बाहरी दबाव का सामना न करना पड़े। मां-बाप को भी सोचना चाहिए कि वे कहीं लोकप्रियता और कमाई के चक्कर में अपने बच्चों पर अनावश्यक दबाव तो नहीं डाल रहे।

देश में रियलिटी शोज की लोकप्रियता का प्रथम बड़ा आधार बना था- केबीसी, लेकिन उसके बाद से अब तक का सफर काफी पड़ावों से गुजरते हुए इस मोड़ पर आ गया है कि आज टीवी बाजर का कुल 20 फीसदी हिस्सा रियलिटी शोज के हवाले है। कमाई की इस धुन में दजर्नों रियलिटी शोज अपने चैनलों की कमाई का बड़ा जरिया बने हुए हैं। देखना है कि यह ‘रियलिटी जादू’ कब तक बरकरार रह पाता है और सीरियलों में बढ़ती असलियत की पैठ किस हद तक इन शोज से दर्शकों को अपनी तरफ मोड़ पाती है।

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