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इंदिरा आवास:सस्ता और टिकाऊ विकल्प ढूंढ़ रही सरकार

इंदिरा आवास का सस्ता और टिकाऊ विकल्प ढूढ़ा जा रहा है। कोशिश यही है कि 35 हजार रुपए में एक ऐसा आशियाना तैयार हो जाए रहने लायक हो और आंधी-पानी, सर्दी और गर्मी में उसमें रहने वाले सहज महसूस करें। ग्रामीण विकास विभाग देश के अन्य राज्यों में तैयार हो रहे इंदिरा आवासों की टेक्नोलॉजी को परख रहा है। आंध्र प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, उड़ीसा में आवासों के निर्माण में क्या कुछ तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है इसके लिए वहां के प्रतिनिधियों की राय ली जा रही है। 

विभाग अवासों के निर्माण के लिए स्थानीय मेटेरियल के इस्तेमाल पर जोर दे रहा है। ईंट के अलावा पत्थर के ईंट और फेस टाइल्स के उपयोग पर भी विचार किया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार आवासों के निर्माण में अधिक से अधिक ऐसे मेटेरियल का इस्तेमाल करने की योजना है जो पर्यावरण के दृष्टि से भी बेहतर हो और सस्ता भी हो। हाल के दिनों में कुछ राज्यों में निर्माण में बांस का चलन भी शुरू हो गया है।

विभाग के इंजीनियरों की मानें तो पुनपुन में जल्द ही प्रयोग के तौर पर एक भवन का निर्माण कराया जाएगा। यह रिसर्च मॉडल होगा। इसमें ईंट की जगह फेस टाइल्स का प्रयोग होगा। फेस टाइल्स में दोनों ओर बर्न मेटरियल होंगे और उसका ब्लॉक बनाकर बीच में मिट्टी भरी जाएगी। इसके अलाव छत पर खपड़ा की तरह ही मेटेरियल इस्तेमाल होगा। इससे घर गर्मी के दिन में भी ठंडा रहेगा।
यह संभावना यह भी है कि लाभार्थियों को पैसे के बदले निर्माण सामग्री उपलब्ध कराया जाए। कई राज्यों में लाभार्थियों को रेडिमेड सीमेंट ब्लॉक और दूसरी निर्माण सामग्री उपलब्ध करायी जाती है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि मकान जल्दी बनकर तैयार हो जाते हैं। बिहार में लाभार्थियों को पैसे दिए जाते हैं लेकिन भौतिक लक्ष्य के मामले में वह अब भी पीछे है।

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