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सभ्यता व अस्तित्व की प्रतीक हैं नदियां

अलकनंदा नदी के तट पर नदी बचाओ आंदोलन से जुड़े देश के अनेक पर्यावरणविद् एवं नदी प्रेमी जुटे। रिवर कंजरवेशन विजन एण्ड मिशन के नाम से आयोजित तीन दिवसीय गोष्ठी के उद्घाटन के अवसर पर बोलते हुए प्रसिद्ध पर्यावरणविद् पद्मभूषण चंडीप्रसाद भट्ट ने कहा कि नदियां सिर्फ जल प्रवाह का नाम नहीं बल्कि वह सभ्यता और व्यक्ति के जीवन अस्तित्व का भी प्रतीक हैं।

भारतीय नदी-घाटी मंच और पीसफुल सोसायटी गोवा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस गोष्ठी में 13 राज्यों के 92 नदी प्रेमी नदियों व पर्यावरण के संरक्षण के लिए अपने विचार आदन-प्रदान करेंगे। पहले दिन मुख्य अतिथि चंडी प्रसाद भट्ट ने कहा कि नदियां सभ्यता और मानव जीवन के अस्तित्व की पहचान हैं। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया में जिस तरह से हिमनाद खत्म होते जा रहे हैं, उससे पानी का संकट होना तय है। उन्होंने कहा कि वनों के अंधाधुंध कटान से धरती में पानी को स्पंज करने की शक्ति का क्षरण हो रहा है। उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण और नदियों को बचाने के जनांदोलन का इतिहास बताते हुए भट्ट ने कहा कि आज जरूरत है कि एक बार फिर नदियों को बचाने के लिए लोग आगे आएं।

इस अवसर पर संयोजक कुमार कलानंद मणि ने कहा कि नदियों को बांधना भारत की संस्कृति और व्यक्ति के अस्तित्व को बांधने का दुष्प्रयास है। गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए प्रो.एबी मिश्र ने कहा कि इस हिमालय ने दुनिया में पर्यावरण संरक्षण के लिए विशिष्ट आंदोलन चिपको आंदोलन को जन्म दिया है। पहले दिन की कार्यशाला का संचालन गोआ के सोटर डिसूजा ने किया।

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