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एक सम्मेलन से उठे सवाल

हिंदुस्तान टाइम्स समिट में एक बार फिर भारी रुसूख वाले राजनीतिज्ञ, उद्योगपति, कलाकार और फिल्म जगत की हस्तियां जुटीं। आर्थिक और सामाजिक महत्व के मसलों पर चर्चा हुईं। इसके दो सत्र सबसे महत्वपूर्ण थे। पहला था, उद्घाटन सत्र- जिसमें प्रधानमंत्री ने आर्थिक, सामाजिक और विदेश नीति के मसलों पर सरकार के नजरिये को सामने रखा। उन्हें उम्मीद है कि देश जल्द ही आठ से नौ फीसदी विकास दर के युग में लौट जाएगा।

दुनिया के आर्थिक मंदी की चपेट में आने से पहले देश इसी रफ्तार से तरक्की कर रहा था। इस सत्र में मैंने प्रधानमंत्री से एक सीधा सवाल पूछा कि यूपीए सरकार ने बीमा, श्रम कानून, बैंकिंग और वित्त क्षेत्र के जिन महत्वपूर्ण कानूनी बदलावों को रोका, क्या अब उन्हें प्राथमिकता मिलेगी? सवाल पूछते समय मैंने यह भी जोड़ दिया कि हाल ही में मैं स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय की सालाना इंडिया कांफ्रेंस से लौटा हूं। वहां यह मसला उठा था कि भारत में जो विकास दर है, उसी दर में चीन और कई दूसरे देशों ने जिस स्तर पर गरीबी को हटाया या रोजगार पैदा किए, उस स्तर का काम भारत में क्यों नहीं हो सका। 

एक बात सभी अर्थशास्त्रियों ने कही कि रोजगार पैदा करने और बेरोजगारी हटाने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि विकास दर बढ़ाई जाए। इसलिए हमारी रणनीति का केंद्रीय तत्व यह होना चाहिए कि विकास दर बढ़ाई जाए। लेकिन नए तथ्य यह बताते हैं कि ऊंची विकास दर का सीधा अर्थ यह नहीं होता कि काफी तादाद में रोजगार पैदा होंगे ही और गरीबी भी घटेगी ही।

अगर आप विकास दर और रोजगार दोनों चाहते हैं तो नई रणनीति अपनानी होगी। इसके लिए कानूनी प्रक्रिया में बदलाव जरूरी है, खासकर श्रम कानूनों में, कर्मचारियों के प्रशिक्षण, उनकी शिक्षा और छोटे शहरों व ग्रामीण इलाकों में उत्पादन केंद्र बनाने के लिए। प्रधानमंत्री ने जब जवाब दिया तो वे इस बात पर मुझसे सहमत थे कि रुके हुए सुधार कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना होगा। उन्हें इस बात का पूरा अहसास था कि विस्तृत सामाजिक पैमाने पर समावेशी विकास के साथ ही विकास दर को बढ़ाना भी जरूरी है। 

उसके तुरंत बाद वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी बोले तो उन्होंने राजनैतिक आम सहमति बनाने पर जोर दिया, क्योंकि सरकार के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है। इन बातों से मैंने यह नतीजा निकाला कि अगले सरकार कई कानूनी सुधार करने जा रही है। हालांकि समस्या अभी इस बात को लेकर भी है कि कितनी जल्द हम विकास दर के आसमान तक पहुंच पाएंगे। हमारा वित्तीय घाटा बहुत ज्यादा है और मुद्रा नीति ढीली-ढाली है, यह सब लंबे समय तक नहीं चल सकेगा। इससे निपटने के तरीका यही है कि ब्याज दर बढ़ाई जाए, राजस्व बढ़ाया जाए और सरकार अपना खर्च घटाए।

अगर इसे तेजी से किया गया तो इसका विकास दर पर असर पड़ेगा। इसलिए बड़ा सवाल यह है कि विकास दर और मुद्रास्फीति को किस तरह से संतुलित किया जाए। इसका कोई आसान तरीका नहीं है और बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि हम कौन सी नीति अपनाते हैं और नए हालात से कैसे निपटते हैं। विकास दर और बचे हुए सुधारों पर प्रधानमंत्री का आत्मविश्वास यह तो बताता ही है कि हाल ही में हुए राज्य विधानसभाओं के चुनाव में मिली कामयाबी ने उन्हें एक नया आश्वासन दिया है।

दूसरा महत्वपूर्ण सत्र था, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज डब्लू. बुश के साथ बातचीत का। सत्र के बाद डिनर में मैं उनके साथ बैठा था और मैंने उनसे एक सवाल भी किया। आम धारणा के विपरीत मैंने यह पाया कि वे काफी विनम्र हैं, वे अपनी गलतियों को स्वीकार करते हैं और चुटकुले सुनाते हैं व खिलखिला कर हंसते भी हैं। मीडिया से तो ऐसा लगता है कि जैसे वे काफी अड़ियल किस्म के इंसान हों, उनमें कोई हास्य बोध न हो और जो जटिल मसलों को समझ न पाते हों। मिलकर लगा कि यह सब बेकार की बाते हैं।

दो उदाहरणों से यह जाहिर हो जाएगा। पहला इस सवाल के जवाब में कि लोकतात्रिक संस्थाओं और लोकतंत्र की विचारधारा से क्या हासिल किया जा सकता है। उन्होंने अपने पिता का उदाहरण दिया जो खुद कभी अमेरिका के राष्ट्रपति थे। दूसरे विश्वयुद्ध में उनके पिता ने जापान के खिलाफ जंग में हिस्सा लिया था। पर्ल हार्बर की लड़ाई के बाद कोई भी अमेरिकी यह सोच नहीं सकता था कि कभी अमेरिका और जापान एक दूसरे के सहयोगी बन जाएंगे।

दोनों के बीच इतनी कड़वाहट थी कि भविष्य में सुधार हो सकेगा, इसकी कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं दिखती थी। युद्ध के बाद जापान ने लोकतंत्र को अपना लिया और इसकी संस्थाओं से ही उसकी सरकार चलने लगी। बुश ने बताया कि जब न्यूयार्क पर 11 सितंबर का आतंकवादी हमला हुआ तो जापान के प्रधानमंत्री कुईजोमी ने उन्हें फोन किया और कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में जापान अमेरिका के साथ है। वे इसे ही लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं की ताकत मानते हैं, इसमें लोग अपने नजरिये को साझा करते हैं।

मैंने जब सीधा सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि वे नहीं मानते कि आर्थिक मंदी पूरी तरह से खत्म हो गई है। उनकी धारणा है कि पुरानी बयार की बहाली में बाधाएं आएंगी, क्योंकि यह इतना आसान रास्ता नहीं है। इसका असर भारत पर भी पड़ेगा ही क्योंकि हम पूरी तरह से विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए हैं। इसका जो भी अर्थ हो, लेकिन बुश अपने उस नजरिए से थोड़ा हटते दिखाई दिए, जिसके हिसाब से नियंत्रण बढ़ने का व्यवसायिकता और रचनात्मकता पर असर पड़ता है।

इसी बातचीत में उन्होंने अपने आपको एक रिटायर राजनेता कहा, यह स्वीकारोक्ति बताती है कि वे अपने साथ अहम् जैसी कोई समस्या लेकर नहीं चलते। अहम् के असर से मुक्त होना एक ऐसी चीज है, जिसे हमारे देश के नेताओं को दुनिया भर की राजनीति से सीखना चाहिए।

hindustanfeedback@gmail.com

लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे केन्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं

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