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कर्नाटक : मजबूत लॉबी से टकराते येदुरप्पा

कर्नाटक सरकार संकट में है, लेकिन यह कोई नई बात नहीं है। मई 2008 में अपने गठन के बाद से येदुरप्पा सरकार पर कम से कम पांच बार संकट आ चुका है। चूंकि यह राज्य में और दक्षिण में भी भाजपा की अपनी पहली सरकार है, इसलिए हर बार संकट से पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व को काफी परेशानी हुई है। हर बार के संकट में पात्र वही रहे हैं, एक तरफ येदुरप्पा और उनके समर्थक और दूसरी तरफ रेड्डी भाइयों का गुट। ज्यादातर मौकों पर मामला स्थानीय स्तर पर ही रफा-दफा हो गया, लेकिन कभी-कभी केन्द्रीय नेतृत्व को भी मध्यस्थता करनी पड़ी। फिर भी मुख्यमंत्री और रेड्डी भाइयों के बीच ताजा झगड़ा कुछ अलग है, इसे शुरू मुख्यमंत्री ने किया है।

बेल्लारी के खनिज सम्राटों से छुटपुट झड़पों के अलावा येदियुरप्पा का राजनैतिक ग्राफ उठान पर ही रहा है। लोकसभा चुनावों के बाद उनकी स्थिति और भी मजबूत हुई, क्योंकि उसमें भाजपा ने 19 सीटें जीतीं, पिछली संसद से तीन ज्यादा। इस बात का महत्व इसलिए भी ज्यादा बढ़ गया, क्योंकि इस चुनाव में आमतौर पर भाजपा की स्थिति दूसरे प्रांतों में कमजोर ही हुई।

येदुरप्पा ने इस बढ़ी हुई हैसियत का फायदा उठाकर रेड्डी भाइयों पर लगाम कसने की कोशिश की, जो बार-बार उन्हें विधानसभा में पूर्ण बहुमत के लिए अपने योगदान की याद दिलाते रहते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, रेड्डी भाइयों ने ‘ऑपरेशन कमल’ को जिला पंचायतों और राजनैतिक रूप से महत्वपूर्ण दुग्ध महासंघों तक फैलाया। उनका अंतिम लक्ष्य मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कब्जा जमाना था।

विमान दुर्घटना में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई. एस. राजशेखर रेड्डी की अचानक मृत्यु से येदुरप्पा को एक मौका मिल गया। उनका कयास यह था कि आईएसआर के बिना रेड्डी भाइयों के व्यापारिक हित कमजोर होंगे और इसीलिए रेड्डी भाइयों- जनार्दन, करुणाकर और सोमशेखर को राजनैतिक रूप से भी कमजोर किया जा सकता है। यह कोई रहस्य नहीं है कि ये भाई व्यापार आंध्र में करते हैं और उस पैसे का इस्तेमाल कर्नाटक की राजनीति में करते हैं।

येदुरप्पा की चालों से रेड्डी भाई विचलित तो हुए। उन्होंने गडग जिले के उपायुक्त को गडग के प्रभारी मंत्री बी. श्रीरामुलु से सलाह किए बिना हटा दिया, वह भी अपर्याप्त बाढ़ राहत के लिए एक मौखिक शिकायत पर। श्रीरामुलु रेड्डी भाइयों के करीबी रिश्तेदार और व्यापार में साङीदार हैं। मुख्यमंत्री ने राहत कमेटी के संयोजक और राहत कार्य के विशेष कार्य अधिकारी के पदों पर नियुक्तियां कर डालीं और करुणाकर रेड्डी को बताया भी नहीं, जो कि राजस्व मंत्री होने के नाते राहत कार्यो के प्रभारी हैं।

दूसरा ‘इकतरफा’ फैसला जो मुख्यमंत्री ने किया, वह था लौह अयस्क, ग्रेनाइट और लकड़ी लादने वाले ट्रकों पर बाढ़ राहत के लिए अधिभार लगाने का। रेड्डी भाइयों ने इस अधिभार को इसलिए बेकार बताया कि उनके मुताबिक ट्रक मालिकों ने खुद ही बाढ़ राहत के लिए 500 करोड़ रुपए देने की घोषणा की थी। आदेश वापस नहीं हुआ और दोनों पक्षों ने सार्वजनिक तौर पर अपने मतभेद उजागर किए। रेड्डी भाइयों ने इस पैसे से एक गृहनिर्माण योजना का भी उद्घाटन किया और भूमि पूजन में मुख्यमंत्री को नहीं बुलाया। येदुरप्पा ने रेड्डी भाइयों पर आंध्र और कर्नाटक के बीच सीमा में हेरफेर करने और आरक्षित जंगल पर कब्जे के आरोपों का भी फायदा उठाने की कोशिश की।

रेड्डी भाई जानते हैं कि वाईएसआर की मृत्यु से उनकी हैसियत कमजोर हो गई है और इसका उपाय यही है कि आईएसआर के पुत्र जगनमोहन रेड्डी आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें। वे दबे-छिपे ढंग से जगनमोहन रेड्डी के लिए काम भी करते रहे। इसी वजह से पिछले हफ्ते आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के. के. रोसैया की बंगलुरु यात्रा और दोनों मुख्यमंत्रियों के बीच घनिष्ठता को संदेह से देखा जा रहा है।

रोसैया के राज में रेड्डी भाइयों को गैर कानूनी खनन और लदान के लिए कानूनी नोटिस जारी किए जा चुके हैं। लगभग एक हफ्ते में ऐसे चार-पांच नोटिस जारी हुए हैं, इससे मालूम होता है कि आंध्र सरकार रेड्डी भाइयों की नकेल कसना चाहती है। इसीलिए रेड्डी भाइयों ने येदुरप्पा पर हमला बोल दिया है। क्या वे अपने समर्थक विधायकों की सहायता से सरकार को गिरा देंगे? येदुरप्पा और भाजपा ऐसी स्थिति में क्या करेगी? जनता दल (एस) की ऐसे में क्या भूमिका होगी? क्या वह उन रेड्डी भाइयों को सबक सिखाने के लिए भाजपा की मदद करेगी, जिन्होंने एचडी कुमारस्वामी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप तब लगाए थे, जब वे भाजपा की मदद से मुख्यमंत्री थे? कर्नाटक की विस्फोटक राजनैतिक स्थिति को देखते हुए कुछ भी अनुमान लगाना मुश्किल है।
 
radhaviswanath73@yahoo.com

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

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