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भक्ति और शोर

माना जाता है कि भक्ति से अंत:करण में पवित्रता आती है। लेकिन आजकल भक्ति के बहुत से कार्यक्रमों और विधानों में ध्वनि विस्तारक यंत्रों का प्रयोग होता है, जिससे परिवेश में ध्वनि प्रदूषण और शोर फैलता है। इसके पर्यावरणीय कुपरिणाम तो होते ही हैं, तमाम लोग, जो उस समय शांतिपूर्वक कुछ विचार करना चाहते है, नहीं कर सकते, क्योंकि लाउडस्पीकरों के शोर में चिंतन, विचार, ध्यान और आराम संभव ही नहीं है।

हिंदू धर्म में ईश्वर को अंतर्यामी कहा गया है। ऋग्वेद में ‘अन्ति सन्तं न जहाति’ का जिक्र है। उपनिषदों में उसे गुह्यचर अर्थात ह्रदय की गुफा में निवास करने वाला कहा गया है। मुण्डक उपनिषद के प्रथम मुण्डक, प्रथम खण्ड, मंत्र 10 में आया है ‘एतद्यो वेद निहित गुह्य’ अर्थात वह परब्रह्मा हृदय की गुफा में निहित है। गीता के अध्याय 15, श्लोक 15 में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है ‘सर्वस्यं चाहं ह्रदि सन्निविष्टो’ यानि मैं सबके हृदयों में विराजमान हूं। इसी प्रकार यज्ञों में सर्वश्रेष्ठ जप यज्ञ माना गया है। जप तीन प्रकार के वर्णित है-मानसिक, उपांशु और बैखरी। अर्थात मन के अंदर, थोड़ा प्रस्फुट स्वर करके और थोड़ा बोल कर। इसमें कहीं नहीं लिखा है कि लाउडस्पीकर पर चिल्लाकर मंत्र पढ़ने या पूजा करने से पुण्य लाभ ज्यादा प्राप्त होगा।

किसी धर्म के अराध्य लाउडस्पीकर या शोर से प्रसन्न होने वाले नहीं है और न ही ऐसे कार्यक्रमों के आयोजकों को ये ठेका मिला है कि वे आसपास के लाखों लोगों को अपनी आवाज कर्णगोचर करा कर ही मानेंगे, चाहे उन्हें अपने किसी अन्य अभीष्ट कार्य में बाधा पड़ रही हो अथवा अशांति और मानसिक उत्पीड़न मिल रहा हो। यह तो पुण्य की बजाय पाप है। दूसरे को पीड़ा पहुंचाना अधर्म कार्य है।

ध्वनिप्रदूषण (नियमितीकरण एवं नियंत्रक) नियमावली के अनुसार रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक ध्वनि विस्तारण यंत्र नहीं बजाए जा सकते। लेकिन अन्य कानून और नियमों की तरह इस नियम की धज्जियां उड़ते आप हर कहीं देख सकते हैं।

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