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कविता की कामयाबी

वियतनाम में आयोजित एशियाई इनडोर खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली कविता गोयल का नाम इसके पहले बॉक्सिंग के क्षेत्र में ज्यादा जाना-पहचाना नहीं था। लेकिन कविता भारतीय मुक्केबाजी या कि भारतीय खेलों में आने वाली नई पीढ़ी की सच्ची प्रतिनिधि है। कविता के पिता दिहाड़ी मजदूर हैं इसलिए उसकी आर्थिक स्थिति की कल्पना ही की जा सकती है, लेकिन साथ ही उम्मीद भी की जा सकती है कि कविता की सफलता उसके परिवार की बेहतरी में मददगार होगी।

बॉक्सिंग में जितने नाम पिछले दिनों चर्चित हुए हैं, चाहे वे पुरुष बॉक्सर हों या महिला बॉक्सर, वे लगभग सभी ऐसी ही आर्थिक पृष्ठभूमि से आए हैं और जहां अपनी प्रतिभा और मेहनत से उन्होंने भारत को विश्व बॉक्सिंग का एक पॉवर हाउस बनाया है, वहीं अपने परिवार के लिए भी वे सामाजिक और आर्थिक बेहतरी लाए हैं। उनकी सफलता उनके आसपास के लोगों के लिए प्रेरणा बनती है और इस तरह ज्यादा तादाद में लड़के-लड़कियां खेलों में अपना नाम बनाने के लिए जुट जाते हैं।

आर्थिक विपन्नता के साथ अच्छी शिक्षा की पहुंच न होना भी जुड़ा हुआ है, ऐसे में खेल काफी हद तक नौजवानों के लिए रचनात्मक तरीके से बेहतर जिन्दगी का सहारा बनते हैं। बॉक्सिंग या एथलेटिक्स या हॉकी वगैरा में पहले भी कोई अच्छी आर्थिक स्थिति वाले बच्चों नहीं आते थे लेकिन इस नई पीढ़ी में एक फर्क यह आया है कि इसके लिए सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर नाम बना लेना काफी नहीं है यह पीढ़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपना दावा पेश करती है।

विजेंदर विश्व रैंकिंग में पहले नंबर पर हैं तो अखिल, जितेंदर और ननाओ सिंह जैसे बॉक्सर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बनाए हुए हैं। लड़कियों में मैरी कॉम विश्व चैंपियनशिप में चार बार स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं और अगले ओलंपिक में भी उनसे स्वर्ण की उम्मीद है। भारत के ग्रामीण इलाकों से निकले कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों से आए इन खिलाड़ियों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जीतने का आत्मविश्वास है। कविता गोयल से भी अब उम्मीद यह है कि 2012 के ओलंपिक में वह पदक लाएगी। हम यही उम्मीद कर कसते हैं कि कविता और बड़ी सफलताएं हासिल करे और उससे प्रेरणा लेकर ऐसे ही कई और खिलाड़ी भी अपना नाम रोशन करें।

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